BSE ODISHA CLASS 9 • UTKAL MASTER STROKE

ବୋର୍ଡ ଅଫ୍ ସେକେଣ୍ଡାରୀ ଏଜୁକେସନ୍ (BSE Odisha) — ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଅଧ୍ୟାୟ ମାଷ୍ଟର ନୋଟ୍ସ

ଶ୍ରେଣୀ: Class 9 | ବିଷୟ: Hindi

ଅଧ୍ୟାୟ: Class9 HindiLit Ch01 Anmol Moti


୧. ଅଧ୍ୟାୟର ସାରାଂଶ ଓ ମାଇଣ୍ଡ ମ୍ୟାପ୍ (Mind Map & Conceptual Architecture)


ଅଧ୍ୟାୟର ସାରାଂଶ:

'अनमोल मोती' ଶୀର୍ଷକ ଅଧ୍ୟାୟଟି ଭକ୍ତିକାଳୀନ ତଥା ରୀତିକାଳୀନ କବିମାନଙ୍କର କିଛି ମୂଲ୍ୟବାନ ରଚନାବଳୀର ସଂକଳନ ଅଟେ । ଏଥିରେ କବୀରଦାସ, ସୂରଦାସ, ତୁଳସୀଦାସ, ରହୀମ ଏବଂ ଗିରିଧର କବିରାୟଙ୍କର ଦୋହା, ପଦ ଓ କୁଣ୍ଡଳିଆ ସ୍ଥାନ ପାଇଛି । ଏହି ରଚନାଗୁଡ଼ିକ ମାନବ ଜୀବନର ବିଭିନ୍ନ ଦିଗ, ନୈତିକତା, ସାମାଜିକ ସଦ୍‌ଭାବନା, ଭକ୍ତିଭାବ ଏବଂ ବ୍ୟବହାରିକ ଜ୍ଞାନ ଉପରେ ଗୁରୁତ୍ୱାରୋପ କରିଛି ।

  • କବୀରଦାସ: ମାନବ ଜୀବନର ଦୁର୍ଲଭତା, ସଜ୍ଜନ ଓ ଦୁର୍ଜନଙ୍କର ସ୍ୱଭାବ ତଥା ସାମାଜିକ କୁସଂସ୍କାର ବିରୁଦ୍ଧରେ ସ୍ୱର ଉତ୍ତୋଳନ କରିଛନ୍ତି । ତାଙ୍କର 'ସାଖୀ' ଜ୍ଞାନ ଓ ଅନୁଭୂତିର ପ୍ରତୀକ ।
  • ସୂରଦାସ: ବାତ୍ସଲ୍ୟ ରସର ମହାନ କବି ଭାବରେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କର ବାଲ୍ୟଲୀଳା, ବିଶେଷକରି ମାଖନ ଚୋରି ପ୍ରସଙ୍ଗକୁ ଅତି ସୁନ୍ଦର ଭାବରେ ବର୍ଣ୍ଣନା କରିଛନ୍ତି ।
  • ତୁଳସୀଦାସ: ମାନବ ଶରୀରକୁ କର୍ମକ୍ଷେତ୍ର ଓ ମନକୁ କୃଷକ ସହିତ ତୁଳନା କରି ପାପ-ପୁଣ୍ୟର ମହତ୍ତ୍ୱ ବୁଝାଇଛନ୍ତି । ଜ୍ଞାନୀ ଓ ଅଜ୍ଞାନୀ ବ୍ୟକ୍ତିଙ୍କର ସ୍ୱଭାବ ଉପରେ ମଧ୍ୟ ଆଲୋକପାତ କରିଛନ୍ତି ।
  • ରହୀମ: ଉତ୍ତମ ପ୍ରକୃତିର ବ୍ୟକ୍ତି ଉପରେ କୁସଙ୍ଗର ପ୍ରଭାବ ନ ପଡ଼ିବା ଏବଂ ବିପତ୍ତି ସମୟରେ ହିଁ ପ୍ରକୃତ ବନ୍ଧୁର ପରିଚୟ ମିଳିବା ବିଷୟରେ କହିଛନ୍ତି ।
  • ଗିରିଧର କବିରାୟ: ବିନା ବିଚାରରେ କାର୍ଯ୍ୟ କରିବାର କୁପରିଣାମ ଉପରେ ଗୁରୁତ୍ୱ ଦେଇଛନ୍ତି । ଅବିଚାରିତ କାର୍ଯ୍ୟ ଯୋଗୁଁ ପଶ୍ଚାତାପ, ଅପମାନ ଓ ମାନସିକ ଅଶାନ୍ତି ଭୋଗିବାକୁ ପଡ଼େ ବୋଲି ବର୍ଣ୍ଣନା କରିଛନ୍ତି ।
  • ଏହି ଅଧ୍ୟାୟଟି ଛାତ୍ରଛାତ୍ରୀମାନଙ୍କୁ ଜୀବନର ମୂଲ୍ୟବୋଧ, ସଦାଚାର, ସାମାଜିକ ସଚେତନତା ଏବଂ ଭକ୍ତିଭାବନା ବିଷୟରେ ଶିକ୍ଷା ପ୍ରଦାନ କରେ ।

    ମାଇଣ୍ଡ ମ୍ୟାପ୍ (Conceptual Architecture):

    ```

    अनमोल मोती (अध्याय)

    ├── कबीरदास (दोहे)

    │ ├── कवि परिचय (जन्म, पालन-पोषण, शिक्षा, कार्य, समाज सुधार, भाषा)

    │ ├── दोहे (मानव जन्म की दुर्लभता, सज्जन-दुर्जन का स्वभाव)

    │ ├── शब्दार्थ

    │ └── भावार्थ

    ├── सूरदास (पद)

    │ ├── कवि परिचय (जन्म, भक्ति, वल्लभाचार्य, ब्रजभाषा, सूरसागर, वात्सल्य रस)

    │ ├── पद (बालकृष्ण की माखन चोरी, यशोदा से शिकायत)

    │ ├── शब्दार्थ

    │ └── भावार्थ

    ├── तुलसीदास (दोहे)

    │ ├── कवि परिचय (जन्म, माता-पिता, रामबोला, गुरु, विवाह, रामभक्ति, रचनाएँ)

    │ ├── दोहे (काया-खेत, मन-किसान, पाप-पुण्य बीज, अज्ञानियों की भलाई)

    │ ├── शब्दार्थ

    │ └── भावार्थ

    ├── रहीम (दोहे)

    │ ├── कवि परिचय (नाम, जन्म, पिता, शिक्षा, अकबर के नवरत्न, धार्मिक सद्भाव, रचनाएँ)

    │ ├── दोहे (उत्तम प्रकृति पर कुसंग का प्रभाव नहीं, सच्चे मित्र की पहचान)

    │ ├── शब्दार्थ

    │ └── भावार्थ

    ├── गिरिधर कविराय (कुंडलिया)

    │ ├── कवि परिचय (जन्मकाल, निवास, नीतिकाव्यकार, कुंडलियों की विशेषता)

    │ ├── कुंडलिया (बिना विचारे काम करने का परिणाम)

    │ ├── शब्दार्थ

    │ └── भावार्थ

    └── अभ्यास प्रश्नावली (प्रत्येक कवि के लिए)

    ├── प्रश्नोत्तर (दो-तीन वाक्य, एक-एक वाक्य, एक-एक शब्द)

    ├── आशय स्पष्टीकरण

    ├── भाषा ज्ञान (शब्दार्थ, पर्यायवाची, विलोम, शुद्ध-अशुद्ध, रिक्त स्थान, वाक्य प्रयोग, तुक मिलाओ, संज्ञा)

    └── कण्ठस्थीकरण / गृहकार्य

    ```


    ୨. ମୁଖ୍ୟ ବିଷୟବସ୍ତୁ, ସିଦ୍ଧାନ୍ତ ଓ ଗାଣିତିକ ସୂତ୍ରାବଳୀ (Comprehensive Theory & Formulas)


    ୨.୧ କବୀରଦାସ (दोहे)

    କବି ପରିଚୟ:

    सन्त कबीर दास का जन्म सन् 1398 में काशी के एक हिन्दू-परिवार में हुआ था। उनका पालन-पोषण नीरू और नीमा नामक मुसलमान जुलाहा दम्पति ने किया। कबीर को किसी विद्यालय में पढ़ने का सुयोग नहीं मिला, लेकिन वे बड़े तेज बुद्धिवाले बालक थे। वे जुलाहे का काम करते थे और दुनिया को देखकर उन्होंने बहुत कुछ सीखा। समाज में व्याप्त बुराइयों को देखकर उन्हें बहुत दुःख हुआ और वे लोगों को अच्छी बातें सिखाने के लिए कमर कसकर खड़े हो गये। जाति-भेद, धार्मिक अन्धविश्वास और बाहरी क्रिया-कलाप जिसमें आन्तरिक भाव नहीं था, कबीर को पसन्द नहीं था। उन्होंने लोगों को काम करने, दूसरों के साथ अच्छा बर्ताव करने, बुद्धि और विचार से काम लेने का आग्रह किया। उन्होंने जाति-धर्म से परे जीवन के मानवतावादी दृष्टिकोण को अपनाया। कबीर ने तप, तीर्थ, व्रत, सन्ध्या, नमाज आदि के बदले नैतिकता, सदाचार, ज्ञान और भगवत् प्रेम पर जोर दिया। 'साखी' शब्द 'साक्षी' का अपभ्रंश रूप है, जो ज्ञान और अनुभूति का प्रतीक है। कबीरदास की साखियाँ इसी ज्ञान और अनुभूति की साक्षी हैं। कबीर की भाषा सधुक्कड़ी है।

    ଦୋହା ଓ ଭାବାର୍ଥ:

    ୧. मनिषा जनम दुर्लभ है, देह न बारम्बार ।

    तरवर थै फल झड़ि पड्या, बहुरि न लागै डार ।।

    शब्दार्थ: मनिषा - मनुष्य, दुर्लभ - मिलना मुश्किल, देह - शरीर, तरवर - पेड़, डार - डाली, बहुरि - फिर से।

    भावार्थ: कबीरदास कहते हैं कि मनुष्य का जन्म बहुत दुर्लभ है, यह शरीर बार-बार नहीं मिलता। जिस प्रकार पेड़ से एक बार फल झड़ जाने के बाद वह दोबारा डाली पर नहीं लग सकता, उसी प्रकार यह मानव शरीर भी एक बार नष्ट हो जाने पर दोबारा नहीं मिलता। इसलिए मनुष्य को इस दुर्लभ जीवन का सदुपयोग करना चाहिए और सांसारिक विषय-वासनाओं को त्यागकर ईश्वर की उपासना करनी चाहिए।

    ୨. सोना सज्जन साधु जन टूटि जुरै सौ बार ।

    दुर्जन कुंभ कुम्हार के, एकै धका दरार ।।

    शब्दार्थ: जुरै - जुड़ जाते हैं, दरार - फटना या मिटना, धका - धक्का या झोंका।

    भावार्थ: कबीरदास कहते हैं कि सज्जन और साधु व्यक्ति सोने के समान होते हैं। जिस प्रकार सोना टूटने के बाद भी सौ बार जोड़ा जा सकता है, उसी प्रकार सज्जन व्यक्ति आपस में कितना भी मनमुटाव होने पर भी अपनी मित्रता बनाए रखते हैं और फिर से जुड़ जाते हैं। इसके विपरीत, दुर्जन व्यक्ति कुम्हार के घड़े के समान होते हैं, जो एक ही धक्के या झटके से टूट जाते हैं और फिर कभी जुड़ नहीं पाते। अर्थात्, दुर्जन लोग छोटी-सी बात पर भी संबंध तोड़ देते हैं।

    ୨.୨ ସୂରଦାସ (पद)

    କବି ପରିଚୟ:

    सूरदास भक्ति-काल के सर्वश्रेष्ठ कृष्ण-भक्त कवि हैं। उनका जन्म सन् 1478 में दिल्ली के निकट सीही नामक गाँव के एक गरीब ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे जन्मान्ध थे या नहीं, इस पर मतभेद है। उन्होंने मथुरा और आगरा के बीच यमुना नदी के तट पर स्थित गऊघाट पर संगीत, काव्य और शास्त्र का अभ्यास किया और विनय के भाव से पदों की रचना की। बाद में वे वल्लभाचार्य के शिष्य बन गये और ब्रज जाकर गोवर्धन के पास पारसोली नामक जगह पर अपना स्थायी निवास बनाकर पद लिखते रहे। सूरदास वात्सल्य रस के बड़े भावुक कवि थे और ब्रजभाषा पर उनका पूरा अधिकार था। 'सूरसागर' उनकी प्रमुख प्रामाणिक रचना है, जिसमें उन्होंने श्रीकृष्ण की बाललीलाओं का बहुत सुन्दर ढंग से वर्णन किया है।

    ପଦ ଓ ଭାବାର୍ଥ:

    "तेरो लाल मेरी माखन खायो ।

    दुपहर दिवस जानि घर सूनी, ढूंढ़ि ढूँढोरि जाय ही आयो ।

    खोल किवार सून मँदिर में, दूध, दही सब माखन खबायो ।

    छींकै काढ़ि खाट चढ़ मोहन, कछु खायो कछु लै ढरकायो ।

    दिन प्रति हानि होत गोरस की, यह ढोटा कौन रंग लायो ।

    सूरदास कहति ब्रजनारि, पूत अनोखो जायो ।"

    शब्दार्थ: लाल - पुत्र, ढूंढि ढूँढोरि - खोज-खाजकर, किवार - किवाड़ या दरवाजा, मँदिर - घर, छींका - शिक्या (रस्सी का जाल जिसमें खाने-पीने की चीजें लटकाई जाती हैं), मोहन - कृष्ण, ढरकायो - गिरा दिया, गोरस - दूध, दही, मठा, छाछ आदि, ढोटा - पुत्र, पूत - पुत्र, अनोखा - आश्चर्यजनक।

    भावार्थ: यह पद बालक कृष्ण की दधि-चोरी की लीला का वर्णन करता है। ब्रजभूमि की एक ग्वालिन माता यशोदा से शिकायत करती है कि "तुम्हारा पुत्र मेरा माखन खा गया है। दोपहर के समय घर सूना जानकर, वह खोज-खाजकर मेरे घर में घुस आया। उसने सूने घर का किवाड़ खोल दिया और घर में जो कुछ दूध-दही-माखन रखा था, वह सब अपने साथियों को खिला दिया। खाट पर चढ़कर उसने छींके पर रखे हुए दही को खा लिया और कुछ गिरा भी दिया। इस प्रकार हर दिन दूध, दही, माखन का नुकसान होता है। पता नहीं, यह लड़का कौन-सा रंग या ढंग लाया है? तुमने तो एक अनोखे लड़के को जन्म दिया है।"

    ୨.୩ ତୁଳସୀଦାସ (दोहे)

    କବି ପରିଚୟ:

    हिन्दी साहित्य के भक्ति-काल में गोस्वामी तुलसीदास का स्थान सर्वोपरि है। उनका जन्म सन् 1532 में भाद्र-शुक्ल एकादशी, मंगलवार को हुआ था। उनके पिता का नाम आत्माराम और माता का नाम हुलसी था। जन्म लेते ही तुलसीदास ने राम-नाम का उच्चारण किया था, इसीलिए उन्हें 'रामबोला' के नाम से भी पुकारा गया। तुलसीदास के गुरु श्री नरहरिदास थे। तुलसीदास का विवाह दीनबंधु पाठक की कन्या रत्नावली से हुआ। पत्नी की प्रेरणा से तुलसीदास अपना घर छोड़कर वैरागी हो गये और राम-भक्ति में लीन हो गये। वे अवधी तथा ब्रजभाषा में काव्य-रचना करते रहे। उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं- रामचरितमानस, कवितावली, गीतावली, दोहावली, बरवै रामायण, रघुवरशलाका, जानकी-मंगल, श्रीरामलला-नहछू, श्रीपार्वतीमंगल और विनय-पत्रिका।

    ଦୋହା ଓ ଭାବାର୍ଥ:

    ୧. तुलसी काया खेत है, मनसा भयो किसान ।

    पाप-पुण्य दोउ बीज हैं, बुवै सो लुनै निदान ।।

    शब्दार्थ: काया - शरीर, मनसा - मन, दोउ - दो, बुवै - बोता है, लुनै - प्राप्त करता है, निदान - अंत में।

    भावार्थ: तुलसीदास कहते हैं कि मानव का शरीर एक खेत के समान है और उसका मन किसान है। पाप और पुण्य दो बीज हैं। मनुष्य जैसा बीज बोता है, अंत में उसी प्रकार का फल प्राप्त करता है। इसका अर्थ है कि मनुष्य अपने कर्मों के अनुसार ही फल पाता है। यदि वह अच्छे कर्म करेगा तो पुण्य फल मिलेगा और बुरे कर्म करेगा तो पाप फल मिलेगा।

    ୨. बहुसुत, बहुरुचि, बहुवचन, बहु अचार-व्यौहार ।

    इनको भलो मनाइबो, यह अज्ञान अपार ।।

    शब्दार्थ: बहुसुत - अनेक संतान, बहुरुचि - अधिक कामना, अपार - ज्यादा, अचार-व्यौहार - आचार-व्यवहार।

    भावार्थ: तुलसीदास कहते हैं कि जान-बूझकर गलती करने वाले को उपदेश देना मूर्खता है। जिस व्यक्ति की अनेक संतानें हों, अनेक कामनाएँ हों, जो बहुत बातें करता हो और जिसके आचार-व्यवहार समय के अनुसार बदलते रहते हों, ऐसे लोगों की भलाई चाहना या उन्हें समझाना बहुत बड़ी मूर्खता है। ऐसे लोग अपनी प्रकृति नहीं बदलते।

    ୨.୪ ରହୀମ (दोहे)

    କବି ପରିଚୟ:

    रहीम का पूरा नाम अब्दुल रहीम खानखाना था। उनका जन्म सन् 1556 के लगभग लाहौर में हुआ था। उनके पिता मुगल बादशाह अकबर के अभिभावक तथा सेनापति बैरम खाँ थे। रहीम मुगलों के महल में पले-बढ़े। वे बड़े प्रतिभाशाली थे और अरबी, तुर्की, फारसी और संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित थे, साथ ही हिन्दी काव्य-कविता के बड़े मर्मज्ञ भी थे। इसलिए अकबर के दरबार के मशहूर नवरत्नों में रहीम गिने जाते थे। वे जन्म से मुसलमान होते हुए भी हिन्दुओं के प्रति प्रेम-भाव रखते थे। रहीम तुलसीदास, सूरदास, तानसेन और केशवदास के समकालीन थे। मार्मिकता और कवि-हृदय की सच्ची संवेदना रहीम के साहित्य की विशेषता है। उन्होंने अपनी रचनाओं में नीति के साथ-साथ भक्ति तथा प्रेम का सरस वर्णन किया है। उन्होंने अपने दोहों में मानव तथा समाज के कल्याण के साथ-साथ हिन्दू-मुस्लिम की एकता पर भी बल दिया है। उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं- रहीम सतसई, श्रृंगार सतसई, रास पंचाध्यायी, रहीम रत्नावली, बरवै नायिका भेद-वर्णन आदि। उनकी काव्य-रचना में प्रयुक्त छन्द हैं- दोहा, कवित्त, सवैया, सोरठा तथा बरवै। रहीम की भाषा ब्रज और अवधी है।

    ଦୋହା ଓ ଭାବାର୍ଥ:

    ୧. जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग ।

    चंदन विष व्यापत नहीं, लपटे रहत भुजंग ।।

    शब्दार्थ: उत्तम - श्रेष्ठ, प्रकृति - गुण, स्वभाव, का - क्या, करि सकत - कर सकता है, कुसंग - बुरी संगति, लपटे - लिपटना, भुजंग - साँप।

    भावार्थ: रहीम कहते हैं कि जो व्यक्ति उत्तम स्वभाव और गुणों वाला होता है, उस पर बुरी संगति का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। अर्थात्, सज्जन व्यक्ति बुरे लोगों के निकट होने पर भी उनकी बुराई को नहीं अपनाता। इसका उदाहरण देते हुए वे कहते हैं कि जिस प्रकार चन्दन के पेड़ पर जहरीले साँप लिपटे रहते हैं, फिर भी चन्दन पर उनके विष का कोई असर नहीं होता, उसी प्रकार उत्तम प्रकृति के व्यक्ति पर कुसंग का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

    ୨. कहि रहीम संपति सगे, बनत बहुत बहु रीत ।

    बिपत्ति कसौटि जे कसे, तेइ साँचे मीत ।।

    शब्दार्थ: संपति - धन-दौलत, सगे - साथी, बहु रीत - बहुत प्रकार से, बिपत्ति - विपत्ति, कसौटि - परख या जाँच, कसे - परखे, तेइ - वही, साँचे - सच्चा, मीत - मित्र।

    भावार्थ: रहीम कहते हैं कि जब किसी व्यक्ति के पास धन-दौलत होती है, तो अनेक लोग विभिन्न तरीकों से उसके मित्र बन जाते हैं। परंतु उनमें से कौन सच्चा मित्र है और कौन नहीं, इस बात का पता विपत्ति के समय चलता है। अर्थात्, सच्चा मित्र वही है जो अपने मित्र को उसके बुरे दिनों में भी न छोड़े, बल्कि उसकी सहायता करे।

    ୨.୫ ଗିରିଧର କବିରାୟ (कुंडलिया)

    କବି ପରିଚୟ:

    गिरिधर कविराय के जीवन के बारे में प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती। शिवसिंह सेंगर ने इनका जन्मकाल सन् 1713 ई. बताया है। लोग इन्हें अवध का निवासी मानते हैं। 'कविराय' नाम से ऐसा लगता है कि वे जाति के भाट थे। गिरिधर कविराय रीतिकाल के प्रसिद्ध नीतिकाव्यकार के रूप में सुपरिचित हैं। उनकी कुंडलियाँ विख्यात हैं और उत्तर भारत की जनता में खूब प्रचलित हैं। इनमें दैनिक जीवन के लिए अत्यंत उपयोगी बातें कही गई हैं। सीधी-सादी तथा सरल भाषा में रचित होने के कारण ये ज्यादा लोकप्रिय हुईं। गिरिधर की कुंडलियाँ अधिकतर अवधी भाषा में ही मिलती हैं।

    କୁଣ୍ଡଳିଆ ଓ ଭାବାର୍ଥ:

    "बिना बिचारे जो करै, सो पाछे पछताय ।

    काम बिगारै आपनो, जग में होत हँसाय ।।

    जग में होत हँसाय, चित्त में चैन न पावै ।

    खान-पान सनमान, राग रँग मनहिं न भावै ।।

    कह गिरिधर कविराय, दुःख कछु टरत न टारे ।

    खटकत है जिय माँहि, कियो जो बिना बिचारे ।।"

    शब्दार्थ: पाछे - पीछे, बाद में, बिगारै - बिगाड़ना, आपनो - अपना, होत - होना, हँसाय - हँसी, मज़ाक, चित्त - मन, चैन - आराम, पान - पीना, राग - गीत-संगीत, भावै - पसंद आना, कछु - कुछ, टरत - टलना, हटना, दूर होना, टारे - टालना, खटकत - बुरा लगना, जिय - हृदय, मन, माँहि - बीच में।

    भावार्थ: गिरिधर कविराय कहते हैं कि जो व्यक्ति बिना सोचे-विचारे कोई काम करता है, उसे बाद में पछताना पड़ता है। ऐसा व्यक्ति अपना काम बिगाड़ लेता है और संसार में उपहास का पात्र बनता है। जब व्यक्ति जग में हँसी का पात्र बनता है, तो उसके मन को शांति नहीं मिलती। उसे खाना-पीना, मान-सम्मान, मनोरंजन आदि कुछ भी अच्छा नहीं लगता। कवि गिरिधर कहते हैं कि ऐसे व्यक्ति के मन में यह बात हमेशा खटकती रहती है कि उसने बिना सोचे-विचारे यह काम क्यों किया। यह दुःख किसी भी तरह टाले नहीं टलता। इसलिए, कोई भी काम करने से पहले भली-भाँति सोच-विचार कर लेना चाहिए ताकि बाद में पछताना न पड़े।


    ୩. ପାଠ୍ୟପୁସ୍ତକ ଅଭ୍ୟାସ ପ୍ରଶ୍ନାବଳୀର ୧୦୦% ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ସମାଧାନ (100% Complete Solved Exercises)


    ୩.୧ କବୀରଦାସ - ପ୍ରଶ୍ନ ଓ ଅଭ୍ୟାସ

    1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दो-तीन वाक्यों में दीजिए ।

    (क) मनुष्य के जन्म को दुर्लभ क्यों कहा गया है ?

    उत्तर: मनुष्य के जन्म को दुर्लभ इसलिए कहा गया है क्योंकि यह शरीर बार-बार नहीं मिलता। जिस प्रकार पेड़ से एक बार फल झड़ जाने के बाद वह दोबारा डाली पर नहीं लग सकता, उसी प्रकार यह मानव शरीर भी एक बार नष्ट हो जाने पर दोबारा प्राप्त नहीं होता। इसलिए इस दुर्लभ मानव जीवन का सदुपयोग करना चाहिए।

    (ख) साधुओं और सज्जनों की तुलना किससे की गयी है और क्यों ?

    उत्तर: साधुओं और सज्जनों की तुलना सोने से की गयी है। जिस प्रकार सोना टूटने के बाद भी सौ बार जोड़ा जा सकता है, उसी प्रकार सज्जन व्यक्ति आपस में कितना भी मनमुटाव होने पर भी अपनी मित्रता बनाए रखते हैं और फिर से जुड़ जाते हैं। वे अपने संबंध आसानी से नहीं तोड़ते।

    (ग) कुम्हार का कुंभ किसे कहा गया है और क्यों ?

    उत्तर: कुम्हार का कुंभ दुर्जन या बुरे व्यक्तियों को कहा गया है। जिस प्रकार कुम्हार का घड़ा एक ही धक्के या झटके से टूट जाता है और फिर कभी जुड़ नहीं पाता, उसी प्रकार दुर्जन लोग छोटी-सी बात पर भी संबंध तोड़ देते हैं और फिर कभी नहीं जुड़ते।

    (घ) कबीरदास के दोहों को 'साखी' क्यों कहा जाता है ?

    उत्तर: 'साखी' शब्द 'साक्षी' का अपभ्रंश रूप है। यह शब्द ज्ञान और अनुभूति का प्रतीक है। कबीरदास के दोहों को 'साखी' इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये वह ज्ञान या अनुभूति हैं जिसे स्वयं कवि ने अपने अन्तःकरण से साक्षात्कार किया है। कबीरदास की साखियाँ इसी ज्ञान और अनुभूति की साक्षी हैं अर्थात् साक्षात्कार करने और करनेवाली हैं।

    2. निम्नलिखित अवतरणों का आशय स्पष्ट कीजिए ।

    (क) मनिषा जनम दुर्लभ है, देह न बारम्बार ।

    आशय: इस पंक्ति का आशय यह है कि मनुष्य का जन्म अत्यंत कठिनाई से मिलता है और यह शरीर बार-बार प्राप्त नहीं होता। यह जीवन अनमोल है और इसे व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए। हमें इस दुर्लभ मानव जीवन का सदुपयोग अच्छे कर्मों में और ईश्वर की भक्ति में करना चाहिए, क्योंकि एक बार यह अवसर हाथ से निकल गया तो फिर वापस नहीं मिलेगा।

    (ख) दुर्जन कुंभ कुम्हार के, एकै धका दरार ।

    आशय: इस पंक्ति का आशय यह है कि दुर्जन व्यक्ति का स्वभाव कुम्हार के घड़े के समान होता है। जिस प्रकार मिट्टी का घड़ा एक ही झटके में टूटकर बिखर जाता है और उसे दोबारा जोड़ा नहीं जा सकता, उसी प्रकार दुर्जन व्यक्ति छोटी-सी बात पर भी अपने संबंध तोड़ देते हैं और फिर कभी उन्हें जोड़ना संभव नहीं होता। वे सज्जनों की तरह संबंधों को बनाए रखने का प्रयास नहीं करते।

    3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक-एक वाक्य में दीजिए ।

    (क) किसके जन्म को दुर्लभ माना गया है ?

    उत्तर: मनुष्य के जन्म को दुर्लभ माना गया है।

    (ख) कौन-कौन टूट जानेके बाद भी जुड़ सकते हैं ?

    उत्तर: सोना, सज्जन और साधुजन टूट जाने के बाद भी जुड़ सकते हैं।

    4. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक-एक शब्द में दीजिए ।

    (क) क्या बार-बार नहीं मिलता ?

    उत्तर: देह (शरीर)।

    (ख) सज्जनों की तुलना किससे की गयी है ?

    उत्तर: सोने से।

    (ग) कुम्हार का कुंभ किसे कहा गया है ?

    उत्तर: दुर्जन को।

    5. कबीरदास के दोहों को कण्ठस्थ कीजिए ।

    उत्तर: (छात्रों को स्वयं कबीरदास के दोहे याद करने हैं।)

    मनिषा जनम दुर्लभ है, देह न बारम्बार ।

    तरवर थै फल झड़ि पड्या, बहुरि न लागै डार ।।

    सोना सज्जन साधु जन टूटि जुरै सौ बार ।

    दुर्जन कुंभ कुम्हार के, एकै धका दरार ।।

    भाषा - ज्ञान

    1. कबीरदास संत थे । काशी में रहते हुए भी उन्होंने देश के विभिन्न स्थानों का भ्रमण किया । अतः उनकी भाषा में विभिन्न प्रदेशों के शब्द पाये जाते हैं । उनकी भाषा में ब्रजभाषा, अवधी, मगही, भोजपुरी, बुन्देलखण्डी, राजस्थानी, पंजाबी आदि का मेल है । साथ ही बोलचाल के क्षेत्रीय प्रभावों के कारण कबीरदास के कुछ शब्द रूपों में परिवर्तन भी देखने को मिलता है । जैसे- मनुष्य से मनिषा, मन से मनवा या मनुवा आदि । उच्चारण के परिवर्तन से वर्त्तनी भी बदल जाती है ।

    नीचे कुछ शब्द दिये जा रहे हैं जिनका मूल रूप लिखिए जो आप समझते हैं -

    मनिषा - मनुष्य

    बहुरि - फिर / दोबारा

    जुरै - जुड़ना

    धका - धक्का

    2. निम्नलिखित शब्दों का समानार्थी शब्द लिखिए ।

    मनिषा - मनुष्य, मानव

    देह - शरीर, काया

    तरवर - पेड़, वृक्ष

    सोना - स्वर्ण, कंचन

    कुंभ - घड़ा, मटका

    3. निम्नलिखित शब्दों का विपरीत शब्द लिखिए ।

    जनम - मरण

    दुर्लभ - सुलभ

    सज्जन - दुर्जन

    साधु - असाधु

    4. निम्नलिखित वाक्यों के रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए ।

    (क) मनिषा जनम दुर्लभ है, देह न बारम्बार ।

    (ख) सोना सज्जन साधुजन जुरै सौ बार ।

    (ग) दुर्जन कुंभ एकै धका दरार ।

    5. निम्नलिखित शब्दों को पाँच-पाँच बार लिखिए ।

    उत्तर: (छात्रों को स्वयं इन शब्दों को पाँच-पाँच बार लिखना है।)

    कबीर - कबीर, कबीर, कबीर, कबीर, कबीर

    अनमोल - अनमोल, अनमोल, अनमोल, अनमोल, अनमोल

    मोती - मोती, मोती, मोती, मोती, मोती

    दुर्लभ - दुर्लभ, दुर्लभ, दुर्लभ, दुर्लभ, दुर्लभ

    कुम्हार - कुम्हार, कुम्हार, कुम्हार, कुम्हार, कुम्हार


    ୩.୨ ସୂରଦାସ - ପ୍ରଶ୍ନ ଓ ଅଭ୍ୟାସ

    1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दो-तीन वाक्यों में दीजिए ।

    (क) ब्रजनारी माता यशोदा से कौन-सी शिकायतें करती हैं ?

    उत्तर: ब्रजनारी माता यशोदा से शिकायत करती है कि उनका पुत्र कृष्ण दोपहर में घर सूना देखकर उनके घर में घुस जाता है। वह किवाड़ खोलकर घर में रखा सारा दूध, दही और माखन खुद खा लेता है और अपने साथियों को भी खिला देता है। वह छींके पर चढ़कर दही निकालता है और कुछ खाकर कुछ गिरा भी देता है, जिससे प्रतिदिन गोरस (दूध, दही) का नुकसान होता है।

    (ख) बालकृष्ण की माखन चोरी का वर्णन कीजिए ।

    उत्तर: बालकृष्ण दोपहर के समय घर सूना देखकर ग्वालिनों के घर में घुस जाते हैं। वे किवाड़ खोलकर अंदर जाते हैं और घर में रखा सारा दूध, दही और माखन खुद खा लेते हैं। वे अपने साथियों को भी खिलाते हैं। माखन खाने के लिए वे खाट पर चढ़कर छींके तक पहुँचते हैं, कुछ माखन खाते हैं और कुछ नीचे गिरा देते हैं। इस प्रकार वे प्रतिदिन माखन की चोरी करते हैं।

    (ग) ब्रजनारी ने माता यशोदा से यह क्यों कहा कि 'पूत अनोखा जायो' ? इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए ।

    उत्तर: ब्रजनारी ने माता यशोदा से 'पूत अनोखा जायो' इसलिए कहा क्योंकि कृष्ण की माखन चोरी की लीलाएँ इतनी अद्भुत और अनोखी थीं कि कोई भी उन्हें समझ नहीं पाता था। कृष्ण प्रतिदिन माखन चोरी करके ग्वालिनों को परेशान करते थे और उनके गोरस का नुकसान करते थे। उनके इस विचित्र व्यवहार को देखकर ब्रजनारी ने आश्चर्यचकित होकर कहा कि यशोदा ने एक अनोखे पुत्र को जन्म दिया है, जिसका व्यवहार सामान्य बच्चों जैसा नहीं है।

    2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक-एक वाक्य में दीजिए ।

    (क) कौन किससे शिकायत करता है ?

    उत्तर: ब्रजनारी माता यशोदा से शिकायत करती है।

    (ख) किस पर चढ़कर कृष्ण दही निकालते हैं ?

    उत्तर: खाट पर चढ़कर कृष्ण दही निकालते हैं।

    (ग) ब्रजनारी ने किसे अनोखा कहा है ?

    उत्तर: ब्रजनारी ने कृष्ण को अनोखा कहा है।

    (घ) 'कौन रंग लायो' का अर्थ क्या है ?

    उत्तर: 'कौन रंग लायो' का अर्थ है 'कौन-सा ढंग या तरीका अपनाया है' या 'कौन-सा स्वभाव दिखाया है'।

    3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक-एक शब्द में दीजिए ।

    (क) यहाँ लाल किसे कहा गया है ?

    उत्तर: कृष्ण को।

    (ख) किस समय घर सूना था ?

    उत्तर: दोपहर।

    (ग) प्रतिदिन किसकी हानि होती थी ?

    उत्तर: गोरस की।

    (घ) दही कहाँ रखा हुआ था ?

    उत्तर: छींके पर।

    भाषा - ज्ञान

    1. 'माखन' एक संज्ञा-पद है । इस तरह इस पद में जितने संज्ञा पद हैं - उन्हें छाँटकर लिखिए । नीचे कुछ शब्द दिये जा रहे हैं जिनका वह रूप लिखिए जो आप समझते हैं -

    याद रखिए - किसी प्राणी, वस्तु या स्थान के नाम, गुण अथवा अवस्था को बतानेवाले शब्द को संज्ञा कहा जाता है ।

    संज्ञा के पांच भेद हैं-

    क. व्यक्तिवाचक संज्ञा - राम, सीता, महानदी, कटक

    ख. जातिवाचक संज्ञा - मनुष्य, गाय, नदी, शहर

    ग. भाववाचक संज्ञा - वीरता, सच्चाई, गरीबी

    घ. समूहवाचक संज्ञा - मेला, गुच्छा, परिवार

    ङ. द्रव्यवाचक संज्ञा - सोना, लोहा

    पद में संज्ञा पद:

    लाल (जातिवाचक/व्यक्तिवाचक - कृष्ण के लिए), माखन (द्रव्यवाचक), दिवस (जातिवाचक), घर (जातिवाचक), किवार (जातिवाचक), मँदिर (जातिवाचक), दूध (द्रव्यवाचक), दही (द्रव्यवाचक), छींकै (जातिवाचक), खाट (जातिवाचक), मोहन (व्यक्तिवाचक - कृष्ण के लिए), गोरस (द्रव्यवाचक), ढोटा (जातिवाचक), ब्रजनारि (जातिवाचक), पूत (जातिवाचक)।

    2. निम्नलिखित शब्दों के पर्यायवाची (समानार्थी) शब्द लिखिए ।

    लाल - पुत्र, बेटा, सुत

    दिवस - दिन, वार, वासर

    पूत - पुत्र, बेटा, सुत

    माखन - नवनीत, मक्खन

    किवार - दरवाजा, द्वार

    अनोखा - अद्भुत, निराला, विचित्र

    3. नीचे लिखे सही शब्द पर सही (√) का चिह्न लगाइए ।

    दिवस - दीवस, दहि- दही, हानि - हानी, नारि - नारी

    उत्तर:

    दिवस - दिवस (√)

    दहि - दही (√)

    हानि - हानि (√)

    नारि - नारी (√)

    4. तुक मिलाइए ।

    मेरी - तेरी

    खायो - आयो / जायो / ढरकायो

    गोरस - सरस


    ୩.୩ ତୁଳସୀଦାସ - ପ୍ରଶ୍ନ ଓ ଅଭ୍ୟାସ

    1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दो-तीन वाक्यों में दीजिए ।

    (क) 'बुवै सो लुनै निदान' का तात्पर्य क्या है ? पठित दोहे के आधार पर समझाइए ।

    उत्तर: 'बुवै सो लुनै निदान' का तात्पर्य है कि मनुष्य जैसा कर्म करता है, अंत में उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है। तुलसीदास के दोहे के अनुसार, मानव शरीर खेत के समान है और मन किसान है। पाप और पुण्य दो बीज हैं। किसान खेत में जैसा बीज बोता है, उसे वैसा ही फल मिलता है। उसी प्रकार, मनुष्य जीवन में जैसे कर्म करता है, उसे अंत में उसी के अनुसार परिणाम भुगतना पड़ता है।

    (ख) किन-किन लोगों की भलाई करने को अज्ञान कहा गया है ?

    उत्तर: तुलसीदास के अनुसार, जिन लोगों की अनेक संतानें हों (बहुसुत), जिनकी अनेक कामनाएँ हों (बहुरुचि), जो बहुत बातें करते हों (बहुवचन) और जिनके आचार-व्यवहार बार-बार बदलते रहते हों (बहु अचार-व्यौहार), ऐसे लोगों की भलाई करने या उन्हें उपदेश देने को अज्ञान कहा गया है। ऐसे लोग अपनी प्रकृति नहीं बदलते।

    2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक-एक शब्द में दीजिए ।

    (क) खेत किसे कहा गया है ?

    उत्तर: काया (शरीर) को।

    (ख) किसान कौन है ?

    उत्तर: मनसा (मन)।

    (ग) पाप-पुण्य क्या हैं ?

    उत्तर: बीज।

    (घ) जिसकी अनेक संतान हों, उसकी भलाई चाहना क्या है ?

    उत्तर: अज्ञान।

    3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक-एक वाक्य में दीजिए ।

    (क) मानव के शरीर को क्या कहा गया है ?

    उत्तर: मानव के शरीर को खेत कहा गया है।

    (ख) दो बीज कौन-कौन - से हैं ?

    उत्तर: दो बीज पाप और पुण्य हैं।

    (ग) बार-बार अपने आचार - व्यवहार को बदलनेवाले की भलाई चाहने को क्या कहा गया है ?

    उत्तर: बार-बार अपने आचार-व्यवहार को बदलनेवाले की भलाई चाहने को अज्ञान कहा गया है।

    भाषा - ज्ञान

    1. निम्नलिखित शब्दों का समानार्थी शब्द लिखिए ।

    काया - शरीर, देह

    किसान - कृषक, खेतिहर

    सुत - पुत्र, बेटा, लाल

    मनसा - मन, चित्त

    2. निम्नलिखित शब्दों का विलोम शब्द लिखिए ।

    पाप - पुण्य

    अज्ञान - ज्ञान

    अपार - सीमित / पार

    3. निम्नलिखित अशुद्ध शब्दों को शुद्ध कीजिए ।

    तुलसि - तुलसी

    किषान - किसान

    पुन्य - पुण्य

    सूत - सुत

    रूचि - रुचि

    4. इन शब्दों पर ध्यान दीजिए ।

    काया, किसान, बीज, सुत

    इन शब्दों से उनकी पूरी जाति का बोध होता है ।

    याद रखिए -

    जिस शब्द से पूरी जाति का बोध होता है, उसे जातिवाचक संज्ञा कहते हैं ।

    उत्तर: (यह केवल जानकारी के लिए है, कोई प्रश्न नहीं है।)


    ୩.୪ ରହୀମ - ପ୍ରଶ୍ନ ଓ ଅଭ୍ୟାସ

    1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दो-तीन वाक्यों में दीजिए ।

    (क) उत्तम प्रकृतिवाले लोगों के प्रति रहीम ने क्या कहा है ?

    उत्तर: उत्तम प्रकृतिवाले लोगों के प्रति रहीम ने कहा है कि उन पर बुरी संगति का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। जिस प्रकार चंदन के पेड़ पर जहरीले साँप लिपटे रहने पर भी चंदन पर उनके विष का कोई असर नहीं होता, उसी प्रकार सज्जन व्यक्ति बुरे लोगों के बीच रहकर भी अपनी अच्छाई नहीं छोड़ते और उनकी बुराई को नहीं अपनाते।

    (ख) सच्चे मित्र का लक्षण क्या है - पठित दोहे के आधर पर समझाइए ।

    उत्तर: रहीम के दोहे के आधार पर सच्चे मित्र का लक्षण यह है कि वह विपत्ति के समय में भी अपने मित्र का साथ नहीं छोड़ता। जब किसी व्यक्ति के पास धन-दौलत होती है, तो अनेक लोग उसके मित्र बन जाते हैं, लेकिन सच्चा मित्र वही होता है जो मित्र के बुरे दिनों में, उसकी कठिनाई के समय में भी उसके साथ खड़ा रहता है और उसकी सहायता करता है।

    2. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक-एक शब्द में दीजिए ।

    (क) किस पर कुसंग का प्रभाव नहीं होता ?

    उत्तर: उत्तम प्रकृतिवाले व्यक्ति पर।

    (ख) चन्दन वृक्ष पर कौन लिपटा रहता है ?

    उत्तर: भुजंग (साँप)।

    (ग) किस पर साँप के विष का प्रभाव नहीं होता ?

    उत्तर: चन्दन पर।

    (घ) साँप के साथ किसकी तुलना की गयी है ?

    उत्तर: कुसंग की।

    (ङ) सच्चा मित्र कौन होता है ?

    उत्तर: जो विपत्ति में साथ दे।

    3. अर्थ स्पष्ट कीजिए ।

    (क) चन्दन विष व्यापत नहीं, लपटे रहत भुजंग ।

    अर्थ: इस पंक्ति का अर्थ है कि चंदन के पेड़ पर भले ही जहरीले साँप लिपटे रहते हैं, लेकिन उन साँपों का विष चंदन के पेड़ पर कोई प्रभाव नहीं डाल पाता। चंदन अपनी शीतलता और सुगंध नहीं छोड़ता। यह उदाहरण उत्तम प्रकृति के व्यक्ति के लिए दिया गया है, जिस पर बुरी संगति का कोई असर नहीं होता।

    (ख) विपत्ति कसौटि जे कसे, तेइ साँचे मीत ।

    अर्थ: इस पंक्ति का अर्थ है कि सच्चा मित्र वही होता है जो विपत्ति की कसौटी पर खरा उतरता है। जब व्यक्ति के पास धन-दौलत होती है, तो अनेक लोग उसके मित्र बन जाते हैं, लेकिन जब उस पर कोई संकट आता है, तब जो मित्र उसका साथ देता है और उसकी सहायता करता है, वही उसका सच्चा मित्र होता है।

    4. पंक्तियाँ पूरी कीजिए ।

    (क) जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग ।

    (ख) बिपत्ति कसौटि जे कसे, तेइ साँचे मीत ।

    भाषा - ज्ञान

    1. निम्नलिखित शब्दों के विपरीत शब्द लिखिए ।

    उत्तम - अधम

    कुसंग - सुसंग

    मित्र - शत्रु

    विष - अमृत

    2. नीचे लिखे अशुद्ध शब्दों को शुद्ध कीजिए ।

    कसौटि - कसौटी

    मीत्र - मित्र

    संपति - संपत्ति

    भूजंग - भुजंग

    उतम - उत्तम

    3. निम्नलिखित शब्दों के समानार्थी शब्द लिखिए ।

    विष - ज़हर, गरल

    भुजंग - साँप, सर्प

    उत्तम - श्रेष्ठ, बढ़िया

    विपत्ति - संकट, मुसीबत

    मित्र - दोस्त, सखा

    4. नीचे लिखे शब्दों का वाक्यों में प्रयोग कीजिए ।

    कुसंग - हमें कुसंग से बचना चाहिए।

    कसौटी - विपत्ति ही सच्चे मित्र की कसौटी है।

    चंदन - चंदन का पेड़ अपनी शीतलता नहीं छोड़ता।

    संपत्ति - धन-संपत्ति आने पर लोग बदल जाते हैं।

    मित्र - मेरा मित्र हमेशा मेरी मदद करता है।


    ୩.୫ ଗିରିଧର କବିରାୟ - ପ୍ରଶ୍ନ ଓ ଅଭ୍ୟାସ

    1. दो-तीन वाक्यों में उत्तर दीजिए :

    (क) बिना सोच और विचार के काम करने से क्या नतीजा होता है ?

    उत्तर: बिना सोच और विचार के काम करने से व्यक्ति को बाद में पछताना पड़ता है। उसका काम बिगड़ जाता है और वह संसार में हँसी का पात्र बनता है। उसके मन को शांति नहीं मिलती और उसे खान-पान, मान-सम्मान, मनोरंजन आदि कुछ भी अच्छा नहीं लगता। यह दुःख उसके मन में हमेशा खटकता रहता है।

    2. एक या दो वाक्यों में उत्तर दीजिए :

    (क) कौन पीछे पछताता है ?

    उत्तर: जो व्यक्ति बिना सोचे-विचारे काम करता है, वह पीछे पछताता है।

    (ख) जगत में किसकी हँसी होती है ?

    उत्तर: जगत में उस व्यक्ति की हँसी होती है जो बिना सोचे-विचारे अपना काम बिगाड़ लेता है।

    (ग) कौन अपना काम बिगाड़ता है ?

    उत्तर: जो बिना सोचे-विचारे काम करता है, वह अपना काम बिगाड़ता है।

    (घ) क्या टालने पर नहीं टलता ?

    उत्तर: बिना विचारे काम करने से उत्पन्न दुःख टालने पर भी नहीं टलता।

    (ङ) मन में कौन-सी बात खटकती रहती है ?

    उत्तर: मन में यह बात खटकती रहती है कि बिना सोचे-विचारे यह काम क्यों किया।

    3. खाली स्थान भरिए :

    (क) जग में होत हँसाय, चित्त में चैन न पावै ।

    (ख) काम बिगारै आपनो, जग में होत हँसाय ।

    (ग) खान-पान सनमान, राग रँग मनहिं न भावै ।

    भाषा - ज्ञान

    1. नीचे लिखे शब्दों से वाक्य बनाइए :

    जग - यह जग बहुत बड़ा है।

    चैन - मुझे आज बिल्कुल चैन नहीं है।

    खान-पान - हमें अपने खान-पान पर ध्यान देना चाहिए।

    दुःख - दुःख में धैर्य रखना चाहिए।

    2. दिये गये उदाहरणों की तरह पाठ से दूसरे तुकांत शब्दों को छाँटिए :

    उदाहरण : पछताय - हँसाय

    उत्तर:

    पावै - भावै

    टारे - बिचारे

    3. 'खान-पान' का अर्थ है 'खान' और 'पान' । इसी प्रकार और पाँच उदाहरण दीजिए ।

    उत्तर: 'खान-पान' का अर्थ है 'खाना' और 'पीना'।

    इसी प्रकार पाँच अन्य उदाहरण:

    1. माता-पिता: माता और पिता

    2. भाई-बहन: भाई और बहन

    3. रात-दिन: रात और दिन

    4. सुख-दुःख: सुख और दुःख

    5. दाल-भात: दाल और भात

    गृहकार्य :

    (क) क्या आप विचार किये बिना कार्य करके उसका नतीजा भोग चुके हैं ? जीवन की एक ऐसी घटना का वर्णन कीजिए ।

    उत्तर: (यह एक व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित प्रश्न है। छात्रों को अपने जीवन की ऐसी किसी घटना का वर्णन करना चाहिए जहाँ उन्होंने बिना सोचे-समझे कोई कार्य किया हो और उसके नकारात्मक परिणाम भुगते हों। उदाहरण के लिए, परीक्षा में बिना तैयारी के जाना, किसी से बिना सोचे-समझे बहस करना, कोई सामान बिना जाँच-पड़ताल के खरीद लेना आदि।)

    (ख) पठित कुंडलिया की आवृत्ति कीजिए और इसे याद रखिए ।

    उत्तर: (छात्रों को गिरिधर कविराय की कुंडलिया को बार-बार पढ़ना और याद करना चाहिए।)


    ୪. ବୋର୍ଡ ପରୀକ୍ଷା ମାଷ୍ଟ୍ରି ଟିପ୍ସ ଓ ସାଧାରଣ ଭୁଲ୍ (Board Exam Tips & Pitfalls)


    ବୋର୍ଡ ପରୀକ୍ଷା ମାଷ୍ଟ୍ରି ଟିପ୍ସ:

    ୧. କବି ପରିଚୟ ମନେରଖନ୍ତୁ: ପ୍ରତ୍ୟେକ କବିଙ୍କର ଜନ୍ମ, ମୃତ୍ୟୁ (ଯଦି ଦିଆଯାଇଛି), ପ୍ରମୁଖ ରଚନା, ଭାଷା ଏବଂ କାବ୍ୟଗତ ବିଶେଷତାକୁ ଭଲ ଭାବରେ ମନେରଖନ୍ତୁ । ଏଥିରୁ ସଂକ୍ଷିପ୍ତ ପ୍ରଶ୍ନ ଆସିପାରେ ।

    ୨. ଦୋହା/ପଦ/କୁଣ୍ଡଳିଆ କଣ୍ଠସ୍ଥ କରନ୍ତୁ: ପାଠ୍ୟପୁସ୍ତକରେ ଥିବା ସମସ୍ତ ଦୋହା, ପଦ ଓ କୁଣ୍ଡଳିଆକୁ କଣ୍ଠସ୍ଥ କରନ୍ତୁ । ଏହା ଆଶୟ ସ୍ପଷ୍ଟ କରିବାରେ ଏବଂ ଖାଲି ସ୍ଥାନ ପୂରଣ କରିବାରେ ସାହାଯ୍ୟ କରିବ ।

    ୩. ଶବ୍ଦାର୍ଥ ଓ ଭାବାର୍ଥ ଉପରେ ଗୁରୁତ୍ୱ ଦିଅନ୍ତୁ: ପ୍ରତ୍ୟେକ ପଦର ଶବ୍ଦାର୍ଥ ଓ ଭାବାର୍ଥକୁ ଗଭୀର ଭାବରେ ବୁଝନ୍ତୁ । ଏହା ଦ୍ୱାରା ପ୍ରଶ୍ନୋତ୍ତର ଲେଖିବା ସହଜ ହେବ ।

    ୪. ଭାଷା - ଜ୍ଞାନ ଅଭ୍ୟାସ କରନ୍ତୁ: ବ୍ୟାକରଣ ଅଂଶ ଯଥା - ସମାନାର୍ଥୀ, ବିପରୀତାର୍ଥକ, ଶୁଦ୍ଧ-ଅଶୁଦ୍ଧ ଶବ୍ଦ, ସଂଜ୍ଞା, ତୁକ ମିଳାଓ, ବାକ୍ୟ ପ୍ରୟୋଗ ଇତ୍ୟାଦିକୁ ଭଲ ଭାବରେ ଅଭ୍ୟାସ କରନ୍ତୁ । ଏହି ଅଂଶରୁ ସିଧାସଳଖ ପ୍ରଶ୍ନ ଆସେ ।

    ୫. ଉତ୍ତର ଲେଖିବାର ଶୈଳୀ: ଦୁଇ-ତିନି ବାକ୍ୟ, ଏକ-ଏକ ବାକ୍ୟ ଓ ଏକ-ଏକ ଶବ୍ଦରେ ଉତ୍ତର ଦେବା ପାଇଁ ଅଭ୍ୟାସ କରନ୍ତୁ । ପ୍ରଶ୍ନର ପ୍ରକାର ଅନୁସାରେ ଉତ୍ତରର ଦୈର୍ଘ୍ୟ ନିର୍ଦ୍ଧାରଣ କରନ୍ତୁ ।

    ୬. ଆଶୟ ସ୍ପଷ୍ଟୀକରଣ: କୌଣସି ପଦ୍ୟାଂଶର ଆଶୟ ସ୍ପଷ୍ଟ କରିବା ସମୟରେ ପ୍ରଥମେ କବି ଓ ପଦ୍ୟାଂଶର ନାମ ଉଲ୍ଲେଖ କରି ତା'ପରେ ତାହାର ଭାବାର୍ଥକୁ ସରଳ ଭାଷାରେ ବୁଝାନ୍ତୁ ।

    ୭. ପୁନରାବୃତ୍ତି ଓ ଲିଖିତ ଅଭ୍ୟାସ: ପଢ଼ିବା ସହିତ ଲେଖି ଅଭ୍ୟାସ କରନ୍ତୁ । ଏହା ଦ୍ୱାରା ଉତ୍ତର ମନେ ରହିବା ସହ ଲେଖିବାର ଗତି ଓ ଶୁଦ୍ଧତା ବଢ଼ିବ ।

    ସାଧାରଣ ଭୁଲ୍ (Common Pitfalls):

    ୧. କବିଙ୍କ ନାମ ଓ ରଚନାରେ ଭୁଲ୍: କବିଙ୍କ ନାମ, ତାଙ୍କର ରଚନା ଏବଂ ପଦ୍ୟାଂଶର ନାମ ଲେଖିବାରେ ଭୁଲ୍ କରିବା ।

    ୨. ଶବ୍ଦାର୍ଥ ଓ ଭାବାର୍ଥରେ ଭ୍ରାନ୍ତି: କଠିନ ଶବ୍ଦର ଅର୍ଥ ନ ବୁଝି ଭାବାର୍ଥ ଲେଖିବାକୁ ଚେଷ୍ଟା କରିବା, ଯାହା ଫଳରେ ଭୁଲ୍ ଉତ୍ତର ଲେଖାଯାଏ ।

    ୩. ବ୍ୟାକରଣଗତ ତ୍ରୁଟି: ସମାନାର୍ଥୀ, ବିପରୀତାର୍ଥକ, ଶୁଦ୍ଧ-ଅଶୁଦ୍ଧ ଶବ୍ଦ ଲେଖିବାରେ ଭୁଲ୍ କରିବା । ହିନ୍ଦୀ ବର୍ଣ୍ଣବିନ୍ୟାସ (Spelling) ଉପରେ ଧ୍ୟାନ ନ ଦେବା ।

    ୪. ପ୍ରଶ୍ନର ଉତ୍ତରର ଦୈର୍ଘ୍ୟ: 'ଏକ ଶବ୍ଦରେ ଉତ୍ତର' ଦେବାକୁ ଥିବା ପ୍ରଶ୍ନର ଉତ୍ତରକୁ ବଡ଼ କରି ଲେଖିବା କିମ୍ବା 'ଦୁଇ-ତିନି ବାକ୍ୟରେ ଉତ୍ତର' ଦେବାକୁ ଥିବା ପ୍ରଶ୍ନର ଉତ୍ତରକୁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ସଂକ୍ଷିପ୍ତ କରିବା ।

    ୫. କଣ୍ଠସ୍ଥ ନ କରିବା: ଦୋହା/ପଦ/କୁଣ୍ଡଳିଆ କଣ୍ଠସ୍ଥ ନ କରିବା ଫଳରେ ଖାଲି ସ୍ଥାନ ପୂରଣ କିମ୍ବା ଆଶୟ ସ୍ପଷ୍ଟୀକରଣ ପ୍ରଶ୍ନରେ ଅସୁବିଧା ହୁଏ ।

    ୬. ଅସ୍ପଷ୍ଟ ହସ୍ତାକ୍ଷର: ଅସ୍ପଷ୍ଟ ହସ୍ତାକ୍ଷର ଯୋଗୁଁ ମୂଲ୍ୟାୟନ ସମୟରେ ଅସୁବିଧା ହୁଏ ଏବଂ ନମ୍ବର କଟିବାର ସମ୍ଭାବନା ଥାଏ ।

    ଏହି ଟିପ୍ସଗୁଡ଼ିକୁ ଅନୁସରଣ କରି ଏବଂ ସାଧାରଣ ଭୁଲଗୁଡ଼ିକୁ ଏଡ଼ାଇ ଛାତ୍ରଛାତ୍ରୀମାନେ ଏହି ଅଧ୍ୟାୟରେ ଭଲ ନମ୍ବର ହାସଲ କରିପାରିବେ ।

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    (ନୋଟ୍ସ ପ୍ରସ୍ତୁତି: ଉତ୍କଳ ସ୍କିଲ୍ ସେଣ୍ଟର - BSE Odisha 100% Full Textbook Master Edition)

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