BSE ODISHA CLASS 9 • UTKAL MASTER STROKE

ବୋର୍ଡ ଅଫ୍ ସେକେଣ୍ଡାରୀ ଏଜୁକେସନ୍ (BSE Odisha) — ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଅଧ୍ୟାୟ ମାଷ୍ଟର ନୋଟ୍ସ

ଶ୍ରେଣୀ: Class 9 | ବିଷୟ: Hindi

ଅଧ୍ୟାୟ: Class9 HindiLit Ch07 Ch07 Shram Ki Pratishtha Bhave


୧. ଅଧ୍ୟାୟର ସାରାଂଶ ଓ ମାଇଣ୍ଡ ମ୍ୟାପ୍ (Mind Map & Conceptual Architecture)


୧.୧ ଅଧ୍ୟାୟର ସାରାଂଶ (Deep Summary)

'श्रम की प्रतिष्ठा' आचार्य विनोबा भावे द्वारा लिखित एक महत्त्वपूर्ण निबंध है, जिसमें उन्होंने श्रम के महत्त्व और गरिमा पर प्रकाश डाला है। विनोबा भावे का पूरा नाम विनायक राव भावे था। उनका जन्म 11 सितंबर, 1895 को महाराष्ट्र के गंगोदा गाँव में हुआ था। वे बचपन से ही गणित और संस्कृत जैसे विषयों में अत्यंत मेधावी थे। अपनी माता की प्रेरणा से वे आजीवन अविवाहित रहे और देश सेवा में लीन रहे। महात्मा गांधी के आदर्शों से प्रभावित होकर उन्होंने सत्य, सेवा और अहिंसा के मार्ग को अपनाया तथा 'सर्वोदय' के स्वप्न को साकार करने का प्रयास किया। गांधीजी की मृत्यु के बाद उन्होंने भूदान, ग्राम-दान और संपत्ति-दान के माध्यम से देश में सकारात्मक क्रांति लाने के लिए पद-यात्राएँ कीं। वे भारतीय दर्शन में गहरी आस्था रखते थे और हिंदी को राष्ट्रभाषा मानते थे। उनकी प्रमुख कृतियों में 'गीता प्रवचन', 'सर्वोदय विचार', 'भूदान-यज्ञ' आदि शामिल हैं।

प्रस्तुत निबंध में विनोबा भावे ने यह विचार प्रस्तुत किया है कि देश का विकास तभी संभव है जब सभी नागरिक श्रम में योगदान दें। वे कर्मयोग की महत्ता पर बल देते हुए कहते हैं कि जो व्यक्ति अपने पसीने से रोटी कमाता है, वह पाप-कर्मों से कोसों दूर रहता है और धर्म-पुरुष बन जाता है। शारीरिक और दिमागी काम का मूल्य समान होना चाहिए। निबंधकार ने श्रमिकों को पृथ्वी का आधार 'शेषनाग' बताया है और रामायण की सीता तथा महाभारत के श्रीकृष्ण का उदाहरण देकर श्रम की महत्ता स्थापित की है।

विनोबा भावे का मानना है कि दिन भर शारीरिक श्रम करने से व्यक्ति को रात में गहरी नींद आती है और उसे पाप-चिंतन का समय नहीं मिलता, जिससे उसका जीवन धार्मिक बनता है। इसके विपरीत, जो लोग काम से जी चुराते हैं या फुरसती रहते हैं, उनके पास खाली समय होता है, और जहाँ समय फाज़िल पड़ा होता है, वहाँ शैतान का काम शुरू हो जाता है, जिससे उनके जीवन में पाप प्रवेश कर जाता है।

लेखक समाज की इस विडंबना पर भी प्रकाश डालते हैं कि देहाती लोग अपने बच्चों को इसलिए पढ़ाना चाहते हैं ताकि उन्हें नौकरी मिल सके और वे शारीरिक श्रम से बच सकें। दिमागी काम करने वाले लोग शारीरिक श्रम करने वालों को नीच समझते हैं और उन्हें कम-से-कम मजदूरी देना चाहते हैं। यहाँ तक कि मजदूर भी अपने काम को लाचारी समझते हैं और उसमें गौरव महसूस नहीं करते।

विनोबा भावे ने भगवान कृष्ण के राजसूय यज्ञ का उदाहरण दिया है, जहाँ कृष्ण ने स्वयं जूठी पत्तलें उठाने और पोंछा लगाने का काम किया, यह दर्शाते हुए कि कोई भी काम छोटा नहीं होता और श्रम का आदर करना चाहिए। वे इस बात की आलोचना करते हैं कि समाज में ज्ञानी, योगी, बूढ़े, बच्चे, व्यापारी, वकील, अध्यापक और विद्यार्थी जैसे वर्गों को काम से मुक्त माना जाता है, जिससे बेकारी बढ़ती है और वे अधिक खाने की माँग करते हैं, जबकि काम नहीं करते।

निबंध का मुख्य संदेश यह है कि हमें काम की इज्जत करनी चाहिए। महात्मा गांधी का उदाहरण देते हुए वे बताते हैं कि गांधीजी दिमागी काम करने के बावजूद प्रतिदिन सूत कातते थे। विनोबा भावे कहते हैं कि दिमागी काम और शारीरिक श्रम करने वालों दोनों के पास दिमाग और हाथ हैं, इसलिए दोनों को काम करना चाहिए। इससे दोनों की इज्जत और प्रतिष्ठा बढ़ेगी। वे 'मेहतर' शब्द का वास्तविक अर्थ 'महत्तर' (महान) बताते हुए कहते हैं कि समाज ने इस महान कार्य करने वाले वर्ग को नीच मानकर उनका अपमान किया है।

अंत में, लेखक दो महत्त्वपूर्ण बातें बताते हैं:

१. हर व्यक्ति को थोड़ा-थोड़ा श्रम अवश्य करना चाहिए, क्योंकि बिना काम किए खाने से जीवन पापी बनता है।

२. सभी कामों का मूल्य समान होना चाहिए।

जब ये दोनों बातें होंगी, तभी श्रम की वास्तविक प्रतिष्ठा स्थापित होगी।

୧.୨ ମାଇଣ୍ଡ ମ୍ୟାପ୍ (Conceptual Mind Map)

```

श्रम की प्रतिष्ठा (Dignity of Labor)

आचार्य विनोबा भावे

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लेखक परिचय (Author Intro) मुख्य विचार (Core Ideas) समाधान/संदेश (Solution/Message)

  • विनायक राव भावे (1895, महाराष्ट्र) - श्रम का महत्व (Importance of Labor) - प्रत्येक व्यक्ति को श्रम करना चाहिए
  • मेधावी, अविवाहित, देश सेवक - कर्मयोग (Work as Worship) - सभी कामों का मूल्य समान हो
  • गांधीजी से प्रभावित, सर्वोदय स्वप्न - शारीरिक व दिमागी श्रम की समानता - काम की इज्जत करना
  • भूदान, ग्राम-दान, संपत्ति-दान - श्रमिक = शेषनाग (पृथ्वी का आधार) - बिना काम किए खाना = पापी जीवन
  • हिंदी प्रेमी, भारतीय दर्शन में आस्था - पसीने से रोटी कमाना = धर्म-पुरुष
  • प्रमुख कृतियाँ: गीता प्रवचन आदि - फुरसत = पाप का कारण (शैतान का काम)
  • समाज की विडंबनाएँ (Societal Ironies)

    .-------------------------------------|-------------------------------------.

    श्रम के प्रति घृणा श्रम का असमान मूल्य गलत धारणाएँ

  • देहाती लोगों का बच्चों को पढ़ाना - दिमागी काम को अधिक महत्व - ज्ञानी, योगी, बूढ़े आदि को काम से मुक्त
  • (श्रम से बचने हेतु) - शारीरिक श्रम को कम महत्व - 'मेहतर' को नीच मानना (जबकि 'महत्तर')

  • मजदूरों का काम को लाचारी समझना - कम मजदूरी देना
  • दिमागी काम करने वालों का मजदूरों को
  • नीच समझना

    उदाहरण (Examples)

    .-------------------------------------|-------------------------------------.

    रामायण (सीता) महाभारत (कृष्ण) महात्मा गांधी

  • सीता का वनवास जाने का निश्चय - राजसूय यज्ञ में कृष्ण का जूठी - दिमागी काम के साथ सूत कातना
  • कौशल्या का कहना "दीप की बाती भी पत्तलें उठाना व पोंछा लगाना
  • जलाने नहीं दी"

  • श्रम की प्रतिष्ठा का अभाव दर्शाना
  • ```


    ୨. ମୁଖ୍ୟ ବିଷୟବସ୍ତୁ, ସିଦ୍ଧାନ୍ତ ଓ ଗାଣିତିକ ସୂତ୍ରାବଳୀ (Comprehensive Theory & Formulas)


    ୨.୧ लेखक परिचय (आचार्य विनोबा भावे)

  • पूरा नाम: विनायक राव भावे।
  • जन्म: 11 सितंबर, सन् 1895 को महाराष्ट्र के गंगोदा गाँव में।
  • विशेषताएँ: बचपन से ही बड़े मेधावी थे, गणित और संस्कृत जैसे विषयों पर उनका पूरा अधिकार था।
  • प्रेरणा: अपनी माता की प्रेरणा से आजीवन अविवाहित रहे और देश की सेवा करते रहे।
  • प्रभाव: महात्मा गांधी के आदर्शों से प्रभावित थे; उन्होंने सत्य, सेवा और अहिंसा के रास्ते को अपनाकर बापू के आदर्शों तथा सिद्धांतों को आगे बढ़ाया।
  • स्वप्न: 'सर्वोदय' को साकार करना उनका स्वप्न था।
  • कार्य: महात्मा गांधी की मौत के बाद विनोबाजी ने देश-भर पद-यात्रा की और भूदान, ग्राम-दान तथा संपत्ति-दान के द्वारा देश में एक सकारात्मक क्रांति लाने का प्रयत्न किया।
  • आस्था: भारतीय दर्शन पर उनकी गहरी आस्था थी।
  • भाषा प्रेम: हिंदी को राष्ट्रभाषा मानते हुए इसके प्रति अपना गहरा प्रेम प्रकट किया। वे अनेक भाषाओं के ज्ञाता थे, पर उनकी अधिकांश पुस्तकें हिंदी में ही हैं।
  • महत्त्वपूर्ण पुस्तकें: गीता प्रवचन, सर्वोदय विचार, विनोबा के विचार, स्वराज-शास्त्र, साहित्यिकों से, भूदान-यज्ञ, गाँव सुखी हम सुखी, शांति-यात्रा, भूदान-गंगा, सर्वोदय-यात्रा, जमाने की मांगें, जीवन और शिक्षण आदि।
  • ୨.୨ निबंध का केंद्रीय विचार (Core Idea of the Essay)

  • 'श्रम की प्रतिष्ठा' निबंध में विनोबाजी ने श्रम के महत्त्व पर प्रकाश डाला है।
  • उनका विचार है कि प्रत्येक व्यक्ति को कुछ-न-कुछ श्रम करना चाहिए।
  • देश का विकास तभी हो सकता है जब इसमें समूचे नागरिकों का योगदान हो।
  • ୨.୩ कर्मयोग की महत्ता (Importance of Karmayoga)

  • निबंधकार ने समाज के सभी वर्ग के लोगों के श्रम करने पर आग्रह किया है।
  • विनोबाजी का विचार है कि जो अपने पसीने से रोटी कमाता है, वह पाप-कर्मों से कोसों भागता है।
  • शारीरिक श्रम और दिमागी काम का मूल्य भी समान होना चाहिए।
  • श्रमिक को शेषनाग सिद्ध करते हुए निबंधकार ने रामायण की सीता और महाभारत के श्रीकृष्ण का उदाहरण देकर देश के सर्वांगीण विकास हेतु श्रम की महत्ता स्थापित की है।
  • ୨.४ पृथ्वी का आधार: श्रमिक (Laborer: The Foundation of Earth)

  • यह पृथ्वी शेषनाग के मस्तक पर स्थित है।
  • अगर शेषनाग का आधार टूट जाए तो पृथ्वी स्थिर नहीं रह सकेगी, यह ज़र्रा-ज़र्रा हो जाएगी।
  • विनोबाजी के अनुसार, दिन भर शरीर-श्रम करने वाले मज़दूर, जो किस्म-किस्म की पैदावार करते हैं, वे ही ये शेषनाग हैं।
  • सबका आधार उन मज़दूरों पर है, इसलिए भगवान ने मज़दूरों को कर्मयोगी कहा है।
  • ୨.୫ श्रम और धार्मिक जीवन (Labor and Religious Life)

  • जो शख्स पसीने से रोटी कमाता है, वह धर्म-पुरुष हो जाता है।
  • उसके जीवन में पाप का आसानी से प्रवेश नहीं हो सकता।
  • दिन भर काम कर लिया तो रात को गहरी नींद आती है।
  • न दिन में पाप-कर्म करने के लिए समय मिलता है, न रात को कुछ सूझ सकता है; क्योंकि थका-माँदा शरीर आराम चाहता है। उसे नींद की ज़रूरत होती है।
  • जिस जीवन में पाप-चिंतन की गुंजाइश ही न हो उसे धार्मिक जीवन होना चाहिए।
  • ୨.୬ फुरसत और पाप (Idleness and Sin)

  • जहाँ समय फाज़िल पड़ा है, वहाँ शैतान का काम शुरू होता है।
  • इसलिए फुरसती लोगों के जीवन में पाप दिखता है।
  • जो श्रम टालता है, वह तो कर्मयोगी हो ही नहीं सकता। उसके जीवन में पाप है तो आश्चर्य नहीं।
  • ୨.७ समाज की गलत धारणाएँ (Wrong Societal Perceptions)

  • मज़दूरी करने वाले कर्म को पूजा नहीं समझते, बल्कि लाचारी से करते हैं। वे काम से मुक्त होने को तैयार रहते हैं।
  • देहाती लोग अपने बच्चों को तालीम इसलिए दिलाना चाहते हैं ताकि उन्हें नौकरी मिले और वे शारीरिक श्रम से बच सकें। यह काम के प्रति घृणा दर्शाता है।
  • दिमागी काम करने वाले लोग मज़दूरों को नीच समझते हैं। वे कम मजदूरी में ज़्यादा काम लेना चाहते हैं।
  • समाज में ज्ञानी, योगी, बूढ़े, बच्चे, व्यापारी, वकील, अध्यापक, विद्यार्थी जैसे वर्गों को काम से मुक्त रहने की धारणा है, जिससे बेकारी बढ़ती है और वे काम न करते हुए भी अधिक खाने की माँग करते हैं।
  • इस कारण अपने समाज में श्रम की प्रतिष्ठा नहीं है।
  • ୨.८ श्रम के आदर के उदाहरण (Examples of Respect for Labor)

  • रामायण से: सीताजी ने रामजी के वनवास जाने पर स्वयं भी साथ जाने का निश्चय किया, जबकि कौशल्या ने कहा था कि उन्होंने सीता को दीप की बाती भी जलाने नहीं दी। यह दर्शाता है कि उस समय काम की प्रतिष्ठा नहीं मानी जाती थी, बल्कि मेहनत को हीन समझा जाता था।
  • महाभारत से: धर्मराज के राजसूय यज्ञ में भगवान कृष्ण ने स्वयं जूठी पत्तलें उठाने और पोंछा लगाने का काम किया, यह दर्शाते हुए कि कोई भी काम छोटा नहीं होता और सभी को श्रम का आदर करना चाहिए।
  • महात्मा गांधी का उदाहरण: महात्मा गांधी दिमागी काम करते थे, फिर भी थोड़ा-सा समय निकालकर दिन में सूत कात लेते थे।
  • ୨.୯ श्रम की प्रतिष्ठा के लिए आवश्यक बातें (Essentials for Dignity of Labor)

  • दिमागी काम और श्रम का मूल्य कम-ज़्यादा रखना गलत है।
  • पहले ब्राह्मण जो ज्ञानी होता था, पढ़ाता था। वह सिर्फ धोती और खाने का अधिकारी था, वह अपरिग्रही माना गया। आज विद्या बेची जाती है।
  • 'कर्म-योग' की महिमा और श्रम की प्रतिष्ठा कायम करनी है तो कीमत में अधिक फर्क नहीं करना चाहिए।
  • शारीरिक-श्रम करने वाले को नीच मानना गलत है। सफाई कर्मचारी जैसे उपकारी व्यक्ति को हम नीचा मानते हैं, उन्हें इज्जत, प्रतिष्ठा और सम्मान नहीं देते।
  • 'मेहतर' शब्द का अर्थ 'महत्तर' (महान) है, पर हमने उसे नीच माना।
  • दो बातें होनी चाहिए:
  • १. हर एक को थोड़ा-थोड़ा श्रम करना ही चाहिए। अगर हम बिना काम किए खाते हैं तो हमारा जीवन पापी बनता है।

    २. कामों का मूल्य समान होना चाहिए।

  • जब यह होगा, तब श्रम की प्रतिष्ठा होगी।
  • ୨.୧୦ शब्दार्थ (Glossary)

  • शेषनाग: पुराणानुसार सहस्र फनों के सर्पराज जिनके फनों पर पृथ्वी ठहरी है।
  • जर्रा-जर्रा: अणु-अणु, कण-कण।
  • किस्म-किस्म: भाँति-भाँति, तरह-तरह।
  • पैदावार: ऊपज, फसल।
  • कर्मयोगी: जो कर्म को योग मानता हो, मेहनती।
  • शख्स: व्यक्ति, जन।
  • व्यसन: किसी भी प्रकार का शौक, बुरी आदत।
  • फाज़िल: आवश्यकता से अधिक, अतिरिक्त।
  • राजसूय यज्ञ: एक यज्ञ जिसके करने का अधिकार केवल ऐसे राजा को होता है, जो सम्राट पद का अधिकारी हो।
  • अपरिग्रही: आवश्यक धन से अधिक का त्याग करनेवाला व्यक्ति।
  • मेहतर: एक जाति जिसका काम मल-मूत्र आदि उठाना है (भंगी), श्रेष्ठ व्यक्ति।

  • ୩. ପାଠ୍ୟପୁସ୍ତକ ଅଭ୍ୟାସ ପ୍ରଶ୍ନାବଳୀର ୧୦୦% ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ସମାଧାନ (100% Complete Solved Exercises)


    प्रश्न और अभ्यास

    1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दो-तीन वाक्यों में दीजिए ।

    (क) कर्मयोगी होने पर कौन-सा फायदा मिलता है ?

    ଉତ୍ତର: कर्मयोगी होने पर व्यक्ति पाप-कर्मों से कोसों दूर रहता है। वह अपने पसीने से रोटी कमाता है, जिससे उसका जीवन धार्मिक बनता है। उसे रात को गहरी नींद आती है और पाप-चिंतन का समय नहीं मिलता।

    (ख) फुरसती लोगों को कर्मयोगी क्यों कहा नहीं जा सकता ?

    ଉତ୍ତର: फुरसती लोगों के पास समय फाज़िल पड़ा होता है, जहाँ शैतान का काम शुरू हो जाता है। वे काम से जी चुराते हैं और कर्म को लाचारी समझते हैं, पूजा नहीं। इसलिए उनके जीवन में पाप आसानी से प्रवेश कर जाता है और उन्हें कर्मयोगी नहीं कहा जा सकता।

    (ग) देहाती लोग अपने बच्चों को तालीम देनेकी बात क्यों करते हैं ?

    ଉତ୍ତର: देहाती लोग अपने बच्चों को तालीम देने की बात इसलिए करते हैं ताकि उन्हें नौकरी मिल सके और वे शारीरिक श्रम से बच सकें। वे सोचते हैं कि नौकरी मिलने से उनके बच्चों को दिन भर खटना नहीं पड़ेगा, जैसा कि वे खुद खटते हैं। यह काम के प्रति उनकी घृणा को दर्शाता है।

    (घ) भगवान् कृष्ण ने श्रम का आदर कैसे किया ?

    ଉତ୍ତର: धर्मराज के राजसूय यज्ञ में भगवान कृष्ण ने स्वयं काम माँगा। जब धर्मराज ने उन्हें पूज्य मानकर काम देने से मना किया, तो कृष्ण ने जूठी पत्तलें उठाने और पोंछा लगाने का काम लिया। इस प्रकार उन्होंने स्वयं शारीरिक श्रम करके श्रम का आदर किया और दिखाया कि कोई भी काम छोटा नहीं होता।

    (ङ) ज्ञानी और मजदूर में क्या फर्क होता है ?

    ଉତ୍ତର: ज्ञानी वह होता है जो ज्ञान प्राप्त करता है और दिमागी काम करता है, जबकि मजदूर शारीरिक श्रम करता है। समाज में ज्ञानी को उच्च और मजदूर को नीच समझा जाता है। ज्ञानी को काम से मुक्त माना जाता है, जबकि मजदूर को लाचारी में काम करना पड़ता है। हालांकि, विनोबा भावे के अनुसार दोनों को समान महत्त्व मिलना चाहिए।

    (च) शारीरिक और दिमागी श्रम की प्रतिष्ठा कैसे बढ़ सकती है ?

    ଉତ୍ତର: शारीरिक और दिमागी श्रम की प्रतिष्ठा तब बढ़ सकती है जब समाज में दोनों प्रकार के कामों का मूल्य समान माना जाए। हर व्यक्ति को थोड़ा-थोड़ा शारीरिक श्रम करना चाहिए और काम को पूजा समझना चाहिए। जब दिमागी काम करने वाले भी शारीरिक श्रम करेंगे और शारीरिक श्रम करने वालों को सम्मान मिलेगा, तभी प्रतिष्ठा बढ़ेगी।

    2. निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर एक-एक वाक्य में दीजिए ।

    (क) शेषनाग किसे कहा गया है ?

    ଉତ୍ତର: दिन भर शरीर-श्रम करने वाले मज़दूरों को शेषनाग कहा गया है।

    (ख) कौन धर्म-पुरुष हो जाता है ?

    ଉତ୍ତର: जो शख्स अपने पसीने से रोटी कमाता है, वह धर्म-पुरुष हो जाता है।

    (ग) किसके जीवन में पाप का आसानी से प्रवेश नहीं हो सकता ?

    ଉତ୍ତର: जो व्यक्ति अपने पसीने से रोटी कमाता है, उसके जीवन में पाप का आसानी से प्रवेश नहीं हो सकता।

    (घ) किसे कर्मयोगी कहा जा सकता है ?

    ଉତ୍ତର: जो व्यक्ति कर्म को योग मानता है और मेहनती होता है, उसे कर्मयोगी कहा जा सकता है।

    (ङ) फुरसती लोगों के जीवन में पाप क्यों दीखता है ?

    ଉତ୍ତର: फुरसती लोगों के पास समय फाज़िल पड़ा होता है, जहाँ शैतान का काम शुरू हो जाता है, इसलिए उनके जीवन में पाप दीखता है।

    (च) मजदूरों को नीच कौन समझता है ?

    ଉତ୍ତର: दिमागी काम करने वाले लोग मजदूरों को नीच समझते हैं।

    (छ) किसने कहा कि सीता को दीप की बाती भी जलाने नहीं आती ?

    ଉତ୍ତର: कौशल्या ने कहा कि सीता को दीप की बाती भी जलाने नहीं आती।

    (ज) कृष्ण ने धर्मराज से क्या कहा ?

    ଉତ୍ତର: कृष्ण ने धर्मराज से कहा कि "आदरणीय हैं तो क्या नालायक हैं! हम काम कर सकते हैं।"

    (झ) ज्ञानी क्या नहीं कर सकते ?

    ଉତ୍ତର: ज्ञानी खा सकते हैं और आशीर्वाद दे सकते हैं, पर काम नहीं कर सकते।

    (ञ) कौन मजदूर कहलाएगा ?

    ଉତ୍ତର: अगर कोई सवेरे उठकर पीसता है तो वह मजदूर कहलाएगा।

    (ट) किसका जीवन धार्मिक नहीं होता ?

    ଉତ୍ତର: जो काम टालते हैं, जो काम नहीं करते हैं, उनका जीवन धार्मिक नहीं होता।

    (ठ) हम काम की इज्जत नहीं करते तो कौन-सा कार्य खोते हैं ?

    ଉତ୍ତର: हम काम की इज्जत नहीं करते तो बड़ा भारी धर्म-कार्य खोते हैं।

    (ड) ब्राह्मण को अपरिग्रही क्यों माना गया था ?

    ଉତ୍ତର: ब्राह्मण को अपरिग्रही माना गया था क्योंकि वह आवश्यक धन से अधिक का त्याग करनेवाला व्यक्ति था और सिर्फ ज्ञानार्जन व अध्यापन करता था।

    (ढ) कब श्रम की प्रतिष्ठा होगी ?

    ଉତ୍ତର: जब हर एक को थोड़ा-थोड़ा श्रम करना होगा और सभी कामों का मूल्य समान होगा, तब श्रम की प्रतिष्ठा होगी।

    3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक-एक शब्द में दीजिए ।

    (क) यह पृथ्वी किसके मस्तक पर स्थित है ?

    ଉତ୍ତର: शेषनाग के

    (ख) भगवान् ने किसे कर्मयोगी कहा है ?

    ଉତ୍ତର: मज़दूरों को

    (ग) अपने पसीने से कौन रोटी कमाता है ?

    ଉତ୍ତର: धर्म-पुरुष

    (घ) किसे कर्मयोगी कहा नहीं जा सकता ?

    ଉତ୍ତର: श्रम टालने वाले को

    (ङ) जहां समय फाज़िल पड़ा होता है, वहां किसका काम शुरू हो जाता है ?

    ଉତ୍ତର: शैतान का

    (च) किन-किन लोगों के जीवन में पाप दिखता है ?

    ଉତ୍ତର: फुरसती लोगों के

    (छ) कौन कहता है कि उनके बच्चों को तालीम मिलनी चाहिए ?

    ଉତ୍ତର: देहाती लोग

    (ज) राजसूय यज्ञ किसने किया था ?

    ଉତ୍ତର: धर्मराज ने

    (झ) कौन-से श्रम की प्रतिष्ठा मानी गयी है ?

    ଉତ୍ତର: शारीरिक और दिमागी दोनों श्रम की

    (ञ) दिमागी काम कौन करता था ?

    ଉତ୍ତର: ज्ञानी (ब्राह्मण)

    (ट) अपरिग्रही किसे माना गया था ?

    ଉତ୍ତର: ब्राह्मण को

    (ठ) बिना काम किये हमारा जीवन कैसा बनता है ?

    ଉତ୍ତର: पापी

    (ड) किसका मूल्य समान होना चाहिए ?

    ଉତ୍ତର: सभी कामों का

    4. निम्नलिखित अवतरणों का आशय स्पष्ट कीजिए ।

    (क) लेकिन सिर्फ कर्म करने से कोई कर्मयोगी नहीं होता ।

    ଆଶୟ: इस पंक्ति का आशय यह है कि केवल शारीरिक श्रम करना ही कर्मयोग नहीं है। यदि व्यक्ति काम को लाचारी या मजबूरी समझकर करता है और उसमें गौरव महसूस नहीं करता, तो वह सच्चा कर्मयोगी नहीं है। सच्चा कर्मयोगी वह है जो कर्म को पूजा मानता है और उसे प्रसन्नता से करता है, न कि केवल पेट भरने के लिए।

    (ख) जहाँ समय फाजिल पड़ा है, वहाँ शैतान का काम शुरू हो जाता है ।

    ଆଶୟ: इस पंक्ति का अर्थ है कि जब व्यक्ति के पास आवश्यकता से अधिक खाली समय होता है और वह उसका सदुपयोग नहीं करता, तो उसका मन बुरे विचारों और पाप-कर्मों की ओर प्रवृत्त होने लगता है। निष्क्रियता और आलस्य व्यक्ति को अनैतिक कार्यों की ओर धकेलते हैं, क्योंकि खाली दिमाग शैतान का घर होता है।

    (ग) ज्ञानी तो खा सकते हैं और आशीर्वाद दे सकते हैं; काम नहीं कर सकते ।

    ଆଶୟ: इस कथन के माध्यम से लेखक समाज की उस विडंबना पर व्यंग्य कर रहे हैं जहाँ ज्ञानियों और बुद्धिजीवियों को शारीरिक श्रम से मुक्त माना जाता है। समाज की यह धारणा है कि ज्ञानी केवल बौद्धिक कार्य करें, उपदेश दें और सम्मान प्राप्त करें, लेकिन उन्हें हाथ से काम करने की आवश्यकता नहीं है। यह श्रम के प्रति समाज की नकारात्मक सोच को दर्शाता है।

    (घ) अगर हम बिना काम किये खाते हैं तो हमारा जीवन पापी बनता है ।

    ଆଶୟ: इस वाक्य का आशय यह है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन-यापन के लिए कुछ-न-कुछ श्रम अवश्य करना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति बिना कोई उत्पादक कार्य किए दूसरों की कमाई पर जीता है, तो वह समाज पर बोझ बनता है और उसका जीवन नैतिक रूप से सही नहीं माना जा सकता। श्रम न करना एक प्रकार का पाप है, क्योंकि यह आलस्य और परजीवीपन को बढ़ावा देता है।

    (ङ) प्रस्तुत निबंध से हमें कौन-सी शिक्षा मिलती है ?

    ଆଶୟ: प्रस्तुत निबंध 'श्रम की प्रतिष्ठा' से हमें यह शिक्षा मिलती है कि श्रम का अत्यधिक महत्त्व है और सभी प्रकार के श्रम, चाहे वह शारीरिक हो या दिमागी, को समान सम्मान मिलना चाहिए। हमें कर्म को पूजा मानना चाहिए और आलस्य तथा काम से घृणा करने से बचना चाहिए। यह निबंध हमें यह भी सिखाता है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने देश और समाज के विकास के लिए कुछ-न-कुछ श्रम अवश्य करना चाहिए, क्योंकि बिना श्रम के जीवन पापी बनता है और समाज में बेकारी बढ़ती है।

    5. रिक्त स्थानों को भरिए ।

    (क) इसलिए भगवान् ने मज़दूरों को कर्मयोगी कहा है ।

    (ख) ऐसा इसलिए होता है कि वे कर्म को पूजा नहीं समझते ।

    (ग) भगवान् ने कहा, आदरणीय हैं तो क्या नालायक हैं ?

    (घ) दिमागी काम करनेवालों को भी हाथ दिये हैं ।

    (ङ) ब्राह्मण जो ज्ञानी होता था, पढ़ाता था ।

    भाषा - ज्ञान

    1. 'देहाती' शब्द देहात के साथ 'ई' प्रत्यय के योग से बना है । शब्द के अंत में आनेवाले शब्दांशों को प्रत्यय कहते हैं । यहाँ 'ई' एक तद्धित प्रत्यय है । हिन्दी में दो प्रत्यय होते हैं - कृदन्त और तद्धित । उपर्युक्त उदाहरण की तरह 'ई' प्रत्यय के योग से बननेवाले शब्दों को प्रस्तुत निबंध से खोजकर लिखिए ।

    ଉତ୍ତର: प्रस्तुत निबंध से 'ई' प्रत्यय के योग से बननेवाले शब्द:

  • फुरसती (फुरसत + ई)
  • ज्ञानी (ज्ञान + ई)
  • योगी (योग + ई)
  • व्यापारी (व्यापार + ई)
  • विद्यार्थी (विद्यार्थ + ई)
  • पापी (पाप + ई)
  • 2. 'यह पृथ्वी शेषनाग के मस्तक पर स्थित है' । इस वाक्य में प्रयुक्त 'पर' अधिकरण कारक की सप्तमी विभक्ति का चिह्न है । इसे परसर्ग भी कहते हैं । प्रस्तुत निबंध में जहाँ-जहाँ इसी परसर्ग 'पर' का प्रयोग हुआ है, उन्हें छाँटकर लिखिए ।

    ଉତ୍ତର: प्रस्तुत निबंध में 'पर' परसर्ग का प्रयोग निम्नलिखित स्थानों पर हुआ है:

  • "गणित और संस्कृत जैसे विषयों पर उनका पूरा अधिकार था।"
  • "भारतीय दर्शन पर उनकी गहरी आस्था थी।"
  • "श्रम के महत्त्व पर प्रकाश डाला है।"
  • "यह पृथ्वी शेषनाग के मस्तक पर स्थित है।"
  • "सबका आधार उन मज़दूरों पर है,"
  • "हिन्दुस्तान में कुछ मज़दूर खेतों पर काम करते हैं,"
  • "पर उस पर उसने निश्चय किया था कि जहाँ रामजी, वहाँ मैं।" (यहाँ 'उस पर' में 'पर' परसर्ग है)
  • 3. निम्नलिखित वाक्यों पर ध्यान दीजिए ।

  • जो शख्स पसीनेसे रोटी कमाता है, वह धर्म-पुरुष हो जाता है ।
  • अगर हम काम की इज्जत नहीं करते तो बड़ा भारी धर्म-कार्य खोते हैं ।
  • शरीर-श्रम करनेवाले को हम नीच मानते हैं ।
  • इन वाक्यों में प्रयुक्त धर्म-पुरुष, धर्म-कार्य और शरीर-श्रम अधिक शब्दों के मेल से बने हैं । जैसे - धर्म (का) पुरुष, धर्म (का) कार्य, शरीर (का) श्रम । जब एकाधिक शब्द एक-दूसरेसे मिल जाते हैं, तब उस मेल को समास कहा जाता है । समास सात प्रकार के होते हैं - अव्ययीभाव, तत्पुरुष समास, नञ् तत्पुरुष, कर्मधारय, द्विगु, द्वन्द्व और बहुब्रीही समास । उपर्युक्त उदाहरण तत्पुरुष समास के हैं ।

    (यह केवल जानकारी है, कोई प्रश्न नहीं।)

    4. 'आज देहाती लोग भी कहते हैं कि हमारे बच्चों को तालीम मिलनी चाहिए ।' इस वाक्य में 'आज देहाती लोग भी कहते हैं' प्रधान वाक्य है और 'हमारे बच्चों को तालीम मिलनी चाहिए' आश्रित वाक्य है । इन दोनों वाक्यों को संयोजक अविकारी शब्द 'कि' मिलाता है । याद रखिए - जिस वाक्य में एक प्रधान वाक्य और एक आश्रित वाक्य हो, उसे मिश्र वाक्य कहते हैं । रचना की दृष्टि से वाक्य के अनेक भेद पाये जाते हैं - सरल वाक्य, मिश्र वाक्य, संयुक्त वाक्य आदि ।

    (यह केवल जानकारी है, कोई प्रश्न नहीं।)

    5. इस पाठ में जीवन, लोग, काम के आगे क्रमशः धार्मिक, देहाती और दिमागी शब्दों का प्रयोग हुआ है । इन शब्दों से उनकी विशेषता उभर कर आती है । पाठ से कुछ ऐसे ही शब्द छाँटिए जो किसी की विशेषता बता रहे हों ।

    ଉତ୍ତର: पाठ से ऐसे शब्द जो किसी की विशेषता बता रहे हैं (विशेषण और विशेष्य):

  • बड़े मेधावी
  • पूरा अधिकार
  • आजीवन अविवाहित
  • सकारात्मक क्रान्ति
  • गहरी आस्था
  • गहरा प्रेम
  • अनेक भाषाओं
  • महत्त्वपूर्ण पुस्तकें
  • प्रत्येक व्यक्ति
  • समूचे नागरिकों
  • शारीरिक श्रम
  • दिमागी काम
  • समान मूल्य
  • सर्वांगीण विकास
  • किस्म-किस्म की पैदावार
  • गहरी नींद
  • थका-माँदा शरीर
  • धार्मिक जीवन
  • फाज़िल समय
  • फुरसती लोगों
  • सच्चे कर्मयोगी
  • देहाती लोग
  • नीच समझते
  • थोड़ा-सा काम
  • बड़ा भारी धर्म-कार्य
  • कम-ज़्यादा मूल्य
  • अपरिग्रही व्यक्ति
  • सारा शहर
  • थोड़ा-थोड़ा श्रम
  • पापी जीवन

  • ୪. ବୋର୍ଡ ପରୀକ୍ଷା ମାଷ୍ଟ୍ରି ଟିପ୍ସ ଓ ସାଧାରଣ ଭୁଲ୍ (Board Exam Tips & Pitfalls)


    ୪.୧ ବୋର୍ଡ ପରୀକ୍ଷା ମାଷ୍ଟ୍ରି ଟିପ୍ସ (Board Exam Mastery Tips)

    ୧. ପାଠ୍ୟପୁସ୍ତକର ଗଭୀର ଅଧ୍ୟୟନ: ପ୍ରତ୍ୟେକ ଅଧ୍ୟାୟକୁ ଅତି ଯତ୍ନର ସହ ପଢ଼ନ୍ତୁ। ଲେଖକ ପରିଚୟ, ମୁଖ୍ୟ ବିଷୟବସ୍ତୁ, ଉଦାହରଣ ଏବଂ ଶବ୍ଦାର୍ଥ ଉପରେ ବିଶେଷ ଧ୍ୟାନ ଦିଅନ୍ତୁ।

    ୨. ସାରାଂଶ ଓ ମୁଖ୍ୟ ବିନ୍ଦୁଗୁଡ଼ିକୁ ମନେ ରଖନ୍ତୁ: ଅଧ୍ୟାୟର ସାରାଂଶ ଏବଂ ମୁଖ୍ୟ ବିନ୍ଦୁଗୁଡ଼ିକୁ ନିଜ ଭାଷାରେ ଲେଖି ଅଭ୍ୟାସ କରନ୍ତୁ। ଏହା ଉତ୍ତର ଲେଖିବାରେ ସାହାଯ୍ୟ କରିବ।

    ୩. ଅଭ୍ୟାସ ପ୍ରଶ୍ନାବଳୀର ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ସମାଧାନ: ପାଠ୍ୟପୁସ୍ତକର ସମସ୍ତ ଅଭ୍ୟାସ ପ୍ରଶ୍ନର ଉତ୍ତର ଲେଖି ଅଭ୍ୟାସ କରନ୍ତୁ। ଏହା ଆପଣଙ୍କୁ ପରୀକ୍ଷାରେ ଆସିବାକୁ ଥିବା ପ୍ରଶ୍ନର ପ୍ରକାର ଏବଂ ଉତ୍ତର ଲେଖିବାର ଶୈଳୀ ବିଷୟରେ ଧାରଣା ଦେବ।

    ୪. ଭାଷା ଜ୍ଞାନ ଉପରେ ଗୁରୁତ୍ୱ: ବ୍ୟାକରଣ ଭାଗ (ଯଥା: ପ୍ରତ୍ୟୟ, କାରକ, ସମାସ, ବାକ୍ୟ ଭେଦ) କୁ ଭଲ ଭାବରେ ବୁଝନ୍ତୁ ଏବଂ ଅଭ୍ୟାସ କରନ୍ତୁ। ଏହା ଆପଣଙ୍କ ଉତ୍ତରକୁ ଅଧିକ ସଠିକ୍ ଏବଂ ପ୍ରଭାବଶାଳୀ କରିବ।

    ୫. ଶବ୍ଦାର୍ଥ ଏବଂ ପରିଭାଷା: ଅଧ୍ୟାୟରେ ଥିବା ସମସ୍ତ ଶବ୍ଦାର୍ଥ ଏବଂ ମୁଖ୍ୟ ପରିଭାଷାଗୁଡ଼ିକୁ ମନେ ରଖନ୍ତୁ। ଏହା ଆପଣଙ୍କ ଶବ୍ଦଭଣ୍ଡାରକୁ ବୃଦ୍ଧି କରିବ ଏବଂ ଉତ୍ତରରେ ସଠିକ୍ ଶବ୍ଦର ପ୍ରୟୋଗ କରିବାରେ ସାହାଯ୍ୟ କରିବ।

    ୬. ଆଶୟ ସ୍ପଷ୍ଟୀକରଣ: ଅବତରଣଗୁଡ଼ିକର ଆଶୟ ସ୍ପଷ୍ଟ କରିବା ଅଭ୍ୟାସ କରନ୍ତୁ। ଏଥିପାଇଁ ଅଧ୍ୟାୟର ଗଭୀର ବୁଝାମଣା ଆବଶ୍ୟକ।

    ୭. ସମୟ ପରିଚାଳନା: ପରୀକ୍ଷାରେ ସମୟ ପରିଚାଳନା ଅତ୍ୟନ୍ତ ଗୁରୁତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ। ନିର୍ଦ୍ଧାରିତ ସମୟ ମଧ୍ୟରେ ସମସ୍ତ ପ୍ରଶ୍ନର ଉତ୍ତର ଦେବା ପାଇଁ ଅଭ୍ୟାସ କରନ୍ତୁ।

    ୮. ସ୍ୱଚ୍ଛ ଏବଂ ସୁନ୍ଦର ହସ୍ତାକ୍ଷର: ସ୍ୱଚ୍ଛ ଏବଂ ସୁନ୍ଦର ହସ୍ତାକ୍ଷରରେ ଉତ୍ତର ଲେଖିବା ଦ୍ୱାରା ପରୀକ୍ଷକଙ୍କ ଉପରେ ଭଲ ପ୍ରଭାବ ପଡ଼େ ଏବଂ ଅଧିକ ନମ୍ବର ମିଳିବାର ସମ୍ଭାବନା ଥାଏ।

    ୪.୨ ସାଧାରଣ ଭୁଲ୍ (Common Pitfalls)

    ୧. ଅଧ୍ୟାୟକୁ ଅଧା ପଢ଼ିବା: ଅନେକ ଛାତ୍ରଛାତ୍ରୀ ଅଧ୍ୟାୟକୁ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ନ ପଢ଼ି କେବଳ ପ୍ରଶ୍ନୋତ୍ତର ଉପରେ ନିର୍ଭର କରନ୍ତି, ଯାହାଦ୍ୱାରା ଗଭୀର ବୁଝାମଣାର ଅଭାବ ରହେ।

    ୨. ଶବ୍ଦାର୍ଥ ଏବଂ ବ୍ୟାକରଣରେ ଅବହେଳା: ଶବ୍ଦାର୍ଥ ଏବଂ ବ୍ୟାକରଣ ଭାଗକୁ ହାଲୁକା ଭାବରେ ନେବା ଦ୍ୱାରା ଉତ୍ତରରେ ଭୁଲ୍ ଶବ୍ଦ ପ୍ରୟୋଗ ଏବଂ ବ୍ୟାକରଣଗତ ତ୍ରୁଟି ହୋଇଥାଏ।

    ୩. ଉତ୍ତରକୁ ମନେ ରଖିବା: ଉତ୍ତରକୁ ନ ବୁଝି କେବଳ ମନେ ରଖିବା ଦ୍ୱାରା ପରୀକ୍ଷାରେ ପ୍ରଶ୍ନର ରୂପ ବଦଳିଗଲେ ଉତ୍ତର ଦେବାରେ ଅସୁବିଧା ହୁଏ।

    ୪. ଅସ୍ପଷ୍ଟ ହସ୍ତାକ୍ଷର: ଅସ୍ପଷ୍ଟ ହସ୍ତାକ୍ଷର ପରୀକ୍ଷକଙ୍କୁ ଉତ୍ତର ପଢ଼ିବାରେ କଷ୍ଟ ଦିଏ, ଯାହା ନମ୍ବର କମାଇପାରେ।

    ୫. ସମୟର ଅଭାବ: ଅଭ୍ୟାସର ଅଭାବରୁ ପରୀକ୍ଷାରେ ସମୟ ପରିଚାଳନା ଠିକ୍ ଭାବରେ ହୋଇପାରେ ନାହିଁ ଏବଂ କିଛି ପ୍ରଶ୍ନ ଛାଡ଼ିଯାଏ।

    ୬. ପ୍ରଶ୍ନକୁ ନ ବୁଝି ଉତ୍ତର ଲେଖିବା: ପ୍ରଶ୍ନକୁ ଭଲ ଭାବରେ ନ ବୁଝି ଉତ୍ତର ଲେଖିବା ଦ୍ୱାରା ଅସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ କିମ୍ବା ଭୁଲ୍ ଉତ୍ତର ଦିଆଯାଇଥାଏ।

    ୭. ଅତିରିକ୍ତ ତଥ୍ୟ ଲେଖିବା: ପ୍ରଶ୍ନର ଆବଶ୍ୟକତାଠାରୁ ଅଧିକ ତଥ୍ୟ ଲେଖିବା ଦ୍ୱାରା ସମୟ ନଷ୍ଟ ହୁଏ ଏବଂ ମୁଖ୍ୟ ବିଷୟବସ୍ତୁରୁ ବିଚ୍ୟୁତ ହେବାର ସମ୍ଭାବନା ଥାଏ।

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    (ନୋଟ୍ସ ପ୍ରସ୍ତୁତି: ଉତ୍କଳ ସ୍କିଲ୍ ସେଣ୍ଟର - BSE Odisha 100% Full Textbook Master Edition)

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