ବୋର୍ଡ ଅଫ୍ ସେକେଣ୍ଡାରୀ ଏଜୁକେସନ୍ (BSE Odisha) — ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଅଧ୍ୟାୟ ମାଷ୍ଟର ନୋଟ୍ସ
ଶ୍ରେଣୀ: Class 9 | ବିଷୟ: Hindi
ଅଧ୍ୟାୟ: Class9 HindiLit Ch08 Mamta Prasad
୧. ଅଧ୍ୟାୟର ସାରାଂଶ ଓ ମାଇଣ୍ଡ ମ୍ୟାପ୍ (Mind Map & Conceptual Architecture)
अध्याय का सारांश (Summary of the Chapter)
'ममता' जयशंकर प्रसाद द्वारा लिखित एक मार्मिक कहानी है जो भारतीय संस्कृति के उच्च आदर्शों, विशेषकर अतिथि-सत्कार और कर्तव्यनिष्ठा को दर्शाती है। कहानी रोहतास दुर्ग के ब्राह्मण मंत्री चूड़ामणि की विधवा पुत्री ममता के इर्द-गिर्द घूमती है। ममता अपने पिता द्वारा पठानों से प्राप्त स्वर्ण-मुद्रा को यह कहकर अस्वीकार कर देती है कि ब्राह्मणों को म्लेच्छों का उत्कोच स्वीकार नहीं करना चाहिए। वह भविष्य की असुरक्षा के बजाय धर्म और स्वाभिमान को महत्व देती है।
शेरशाह द्वारा रोहतास दुर्ग पर अधिकार करने और पिता की मृत्यु के बाद ममता एक बौद्ध मठ के खंडहर में शरण लेती है और अपना जीवन ईश्वर भक्ति में बिताती है। एक दिन, चौसा के युद्ध में शेरशाह से पराजित मुगल बादशाह हुमायूँ थका-हारा, प्यासा और असहाय होकर ममता की झोंपड़ी में आश्रय माँगता है। ममता पहले तो उसे अपने पिता का हत्यारा और विधर्मी मानकर आश्रय देने में हिचकिचाती है, लेकिन अंततः 'अतिथि देवो भव' के भारतीय संस्कार और अपने ब्राह्मण धर्म का पालन करते हुए उसे आश्रय देती है। वह स्वयं टूटी दीवारों के पीछे चली जाती है और हुमायूँ को अपनी झोंपड़ी में विश्राम करने देती है।
अगले दिन हुमायूँ अपने सैनिकों को ममता को खोजने का आदेश देता है, लेकिन ममता नहीं मिलती। हुमायूँ मिरजा को उस स्थान पर एक घर बनवाने का आदेश देकर चला जाता है। लगभग 47 साल बाद, जब अकबर मुगल बादशाह बनता है, तो उसकी आज्ञा से मिरजा उस स्थान पर ममता का घर बनवाने आता है। तब तक ममता 70 वर्ष की वृद्धा हो चुकी होती है। वह मुगलों को अपनी झोंपड़ी सौंपकर स्वर्ग सिधार जाती है। बाद में उस स्थान पर हुमायूँ की स्मृति में एक अष्टकोण मंदिर बनवाया जाता है, लेकिन उस पर ममता का नाम कहीं नहीं लिखा जाता, जिसने निस्वार्थ भाव से एक संकटग्रस्त व्यक्ति की सहायता की थी। यह कहानी ममता के त्याग, कर्तव्यनिष्ठा और भारतीय संस्कृति के शाश्वत मूल्यों को उजागर करती है।
माइंड मैप एवं वैचारिक संरचना (Mind Map & Conceptual Architecture)
1. ममता का परिचय: रोहतास दुर्ग, विधवा जीवन, पिता चूड़ामणि की चिंता।
2. स्वर्ण-मुद्रा प्रसंग: चूड़ामणि द्वारा पठानों से प्राप्त स्वर्ण-मुद्रा भेंट करना, ममता द्वारा अस्वीकार (म्लेच्छ का उत्कोच, ब्राह्मण धर्म)।
3. रोहतास दुर्ग का पतन: शेरशाह का अधिकार, चूड़ामणि की मृत्यु, ममता का पलायन।
4. बौद्ध मठ में शरण: ममता का खंडहर में जीवन, ईश्वर भक्ति।
5. हुमायूँ का आगमन: चौसा युद्ध में पराजित, आश्रय की याचना।
6. ममता का द्वंद्व: पिता का हत्यारा (विधर्मी) vs. अतिथि धर्म।
7. अतिथि सत्कार: ममता द्वारा हुमायूँ को आश्रय देना, स्वयं कष्ट सहना।
8. हुमायूँ का प्रस्थान: ममता को खोजने का आदेश, मिरजा को घर बनवाने का आदेश।
9. 47 वर्ष बाद: अकबर का शासन, मिरजा का आगमन, ममता का वृद्धावस्था।
10. ममता का देहांत: झोंपड़ी सौंपकर स्वर्ग सिधारना।
11. मंदिर निर्माण: हुमायूँ की स्मृति में अष्टकोण मंदिर, ममता का नाम न होना।
୨. ମୁଖ୍ୟ ବିଷୟବସ୍ତୁ, ସିଦ୍ଧାନ୍ତ ଓ ଗାଣିତିକ ସୂତ୍ରାବଳୀ (Comprehensive Theory & Formulas)
२.१ कहानीकार का परिचय: जयशंकर प्रसाद
२.२ कहानी 'ममता' का विस्तृत विश्लेषण
२.२.१ कहानी का आरंभ और ममता का परिचय:
कहानी रोहतास दुर्ग के प्रकोष्ठ (कमरे) से शुरू होती है, जहाँ युवती ममता शोण नदी के तीक्ष्ण प्रवाह को देख रही है। ममता विधवा है और उसका यौवन भी शोण के समान उमड़ रहा है, लेकिन उसके मन में वेदना, मस्तक में आँधी और आँखों में पानी की बरसात है। वह सुख के कंटक-शयन में विकल है। वह रोहतास दुर्गपति के मंत्री चूड़ामणि की अकेली पुत्री है। उसके लिए किसी वस्तु का अभाव असंभव है, फिर भी वह विधवा है, और हिन्दू विधवा को संसार में सबसे तुच्छ और निराश्रय प्राणी माना जाता है।
२.२.२ चूड़ामणि की चिंता और स्वर्ण-मुद्रा प्रसंग:
चूड़ामणि अपनी पुत्री की इस दशा से व्यथित हैं। वे चुपचाप ममता के प्रकोष्ठ में आते हैं, लेकिन ममता अपने दुःख में इतनी डूबी है कि पिता के आने का पता भी नहीं चलता। चूड़ामणि बाहर चले जाते हैं, पर उनके मन में बड़ी दुश्चिन्ता है। एक पहर रात बीतने पर वे फिर ममता के पास आते हैं, उनके पीछे दस सेवक चाँदी के थालों में कुछ लिए खड़े हैं। मंत्री थालों को रखने का संकेत करते हैं। ममता पूछती है, "यह क्या है पिताजी?" चूड़ामणि आवरण उलटते हैं, तो सुवर्ण का पीलापन विकीर्ण होने लगता है। ममता चौंक उठती है, "इतना स्वर्ण! यह कहाँ से आया?" चूड़ामणि कहते हैं, "यह तुम्हारे लिए है।" ममता इसे म्लेच्छ (पठानों) का उत्कोच (रिश्वत) मानकर अस्वीकार कर देती है और कहती है कि हम ब्राह्मण हैं, इतना सोना लेकर क्या करेंगे? यह अर्थ नहीं, अनर्थ है। चूड़ामणि बताते हैं कि रोहतास दुर्ग का अंत समीप है, शेरशाह कभी भी अधिकार कर सकता है, तब मंत्रित्व नहीं रहेगा, यह सोना उस समय के लिए है। ममता इसे परमपिता की इच्छा के विरुद्ध साहस मानती है और कहती है कि क्या भीख भी नहीं मिलेगी, क्या कोई हिन्दू ब्राह्मण को दो मुट्ठी अन्न नहीं देगा? वह सोने की चमक से काँप उठती है। चूड़ामणि उसे 'मूर्ख' कहकर चले जाते हैं।
२.२.३ रोहतास दुर्ग का पतन और ममता का पलायन:
अगले दिन जब डोलियों का तांता दुर्ग के भीतर आ रहा होता है, तो चूड़ामणि का हृदय धक्-धक् करने लगता है। वे तोरण पर जाकर डोलियों का आवरण खुलवाना चाहते हैं। पठान इसे महिलाओं का अपमान बताते हैं। बात बढ़ जाती है, तलवारें खिंचती हैं और ब्राह्मण मंत्री चूड़ामणि वहीं मारे जाते हैं। राजा, रानी और कोष सब छली शेरशाह के हाथ पड़ जाते हैं। डोलियों में भरे पठान सैनिक दुर्ग भर में फैल जाते हैं, लेकिन ममता नहीं मिलती। वह भाग निकलती है।
२.२.४ बौद्ध मठ के खंडहर में ममता का जीवन:
काशी के उत्तर में धर्मचक्र बिहार, जो मौर्य और गुप्त सम्राटों की कीर्ति का खंडहर था, वहाँ ममता शरण लेती है। वह भग्नचूड़ा (टूटे हुए शिखर), तृणगुल्मों (घास-फूस) से ढके प्राचीर (दीवारों) और ईंटों के ढेर में बिखरी भारतीय शिल्प की विभूति के बीच रहती है। ग्रीष्म रजनी की चन्द्रिका में वह स्थान शीतल प्रतीत होता है। जहाँ पंचवर्गीय भिक्षु गौतम का उपदेश ग्रहण करने के लिए पहले मिले थे, उसी स्तूप के भग्नावशेष की मलिन छाया में एक झोंपड़ी के दीपालोक में ममता पाठ कर रही थी।
२.२.५ हुमायूँ का आगमन और ममता का द्वंद्व:
पाठ रुक जाता है। एक भीषण और हताश आकृति दीप के मंद प्रकाश में सामने खड़ी है। स्त्री (ममता) कपाट बंद करना चाहती है, पर वह व्यक्ति (हुमायूँ) आश्रय माँगता है। ममता पूछती है, "तुम कौन हो?" वह कहता है, "मैं मुगल हूँ। चौसा युद्ध में शेरशाह से विपन्न होकर रक्षा चाहता हूँ। इस रात अब आगे चलने में असमर्थ हूँ।" ममता यह सुनकर अपने होंठ काट लेती है। हुमायूँ कहता है, "हाँ, माता!" ममता उसे क्रूर, रक्त का प्यासा और निष्ठुर बताती है, और अपनी कुटी में स्थान देने से मना करती है। हुमायूँ बताता है कि उसका गला सूख रहा है, साथी छूट गए हैं, अश्व गिर पड़ा है, वह बहुत थका हुआ है। यह कहकर वह धम से बैठ जाता है और उसे ब्रह्माण्ड घूमता हुआ प्रतीत होता है। ममता सोचती है कि यह विपत्ति कहाँ से आई। वह उसे जल देती है, जिससे मुगल के प्राणों की रक्षा होती है। ममता के मन में द्वंद्व चलता है: "सब विधर्मी दया के पात्र नहीं - मेरे पिता का वध करने वाले आततायी!" घृणा से उसका मन विरक्त हो जाता है।
२.२.६ अतिथि सत्कार और हुमायूँ का प्रस्थान:
स्वस्थ होकर मुगल पूछता है, "माता! तो फिर मैं चला जाऊँ?" ममता विचार करती है: "मैं ब्राह्मण हूँ, मुझे तो अपने धर्म - अतिथि देव की उपासना का पालन करना चाहिए; परन्तु यहाँ... नहीं नहीं, यह सब विधर्मी दया के पात्र नहीं; परन्तु यह दया तो नहीं कर्त्तव्य करना है। तब?" मुगल तलवार टेक कर उठ खड़ा होता है। ममता कहती है, "क्या आश्चर्य है कि तुम भी छल करो।" मुगल कहता है, "छल! नहीं, तब नहीं स्त्री! जाता हूँ, तैमूर का वंशधर स्त्री से छल करेगा! जाता हूँ, भाग्य का खेल है।" ममता मन में कहती है, "यहाँ कौन दुर्ग है! यही झोंपड़ी है, जो चाहे ले ले। मुझे तो अपना कर्त्तव्य करना पड़ेगा।" वह बाहर आकर मुगल से कहती है, "जाओ भीतर, थके हुए भयभीत पथिक! तुम चाहे कोई हो, मैं तुम्हें आश्रय देती हूँ। मैं ब्राह्मण-कुमारी हूँ, सब अपना धर्म छोड़ दें तो मैं भी क्यों छोड़ दूँ?" मुगल चन्द्रमा के मंद प्रकाश में उसके महिमामय मुखमंडल को देखता है और मन ही मन नमस्कार करता है। ममता पास की टूटी दीवारों में चली जाती है और थका पथिक झोंपड़ी में विश्राम करता है।
प्रभात में ममता खंडहर की संधि (दरार) से देखती है कि सैकड़ों अश्वारोही उस प्रांत में घूम रहे हैं। वह अपनी मूर्खता पर अपने को कोसने लगती है। झोंपड़ी से निकलकर पथिक कहता है, "मिरजा! मैं यहाँ हूँ।" यह सुनकर प्रसन्नता की चीत्कार-ध्वनि से प्रांत गूँज उठता है। ममता अधिक भयभीत होकर मृगदाव (हिरणों के वन) में छिप जाती है और दिन भर बाहर नहीं निकलती। संध्या को जब उनके जाने का उपक्रम होता है, तो ममता सुनती है कि पथिक घोड़े पर सवार होते हुए मिरजा से कह रहा है, "मिरजा! उस स्त्री को मैं कुछ भी न दे सका। उसका घर बनवा देना, क्योंकि विपत्ति में मैंने यहाँ आश्रय पाया था। यह स्थान भूलना मत।" इसके बाद वे चले जाते हैं।
२.२.७ कहानी का अंतिम भाग: 47 वर्ष बाद और मंदिर निर्माण:
चौसा के मुगल-पठान युद्ध को बहुत दिन बीत जाते हैं। ममता अब सत्तर वर्ष की वृद्धा है। वह अपनी झोंपड़ी में एक दिन पड़ी थी। शीतकाल का प्रभाव था। उसका जीर्ण कंकाल खाँसी से गूँज रहा था। गाँव की दो-तीन स्त्रियाँ उसकी सेवा के लिए उसे घेर कर बैठी थीं, क्योंकि वह आजीवन सब के सुख-दुःख की सहभागिनी रही थी। ममता जल पीना चाहती है, एक स्त्री सीपी से जल पिलाती है। सहसा एक अश्वारोही उसी झोंपड़ी के द्वार पर दिखाई पड़ता है। वह अपनी धुन में कहता है, "मिरजा ने जो चित्र बनाकर दिया है, वह तो इसी जगह का होना चाहिए। वह बुढ़िया मर गई होगी। अब किससे पूछें कि एक दिन शाहंशाह हुमायूँ किस छप्पर के नीचे बैठे थे? यह घटना भी तो सैंतालीस वर्ष से ऊपर की हुई।"
ममता अपने विकल कानों से सुनती है और पास की स्त्री से कहती है, "बुलाओ।" अश्वारोही पास आता है। ममता रुक-रुक कर कहती है, "मैं नहीं जानती वह शाहंशाह था या साधारण मुगल; पर एक दिन इसी झोंपड़ी के नीचे वह रहा था। मैंने सुना था, वह मेरा घर बनाने की आज्ञा दे गया था। मैं आजीवन अपनी झोंपड़ी खुदवाने के डर से भयभीत रही थी।" वह आगे कहती है, "भगवान ने सुन लिया, मैं आज इसे छोड़े जाती हूँ। अब तुम इसका मकान बनाओ या महल; मैं अपने चिर विश्राम-गृह में जाती हूँ।" वह अश्वारोही अवाक् खड़ा रह जाता है। बुढ़िया के प्राण-पक्षी अनंत में उड़ जाते हैं।
वहाँ एक अष्टकोण मंदिर बनता है और उस पर शिलालेख लगाया जाता है: "सातों देशों के नरेश हुमायूँ ने एक दिन यहाँ विश्राम किया था। उनके पुत्र अकबर ने उसकी स्मृति में यह गगनचुम्बी मंदिर बनवाया।" पर उस मंदिर में ममता का कहीं नाम न था।
२.३ शब्दार्थ (Word Meanings)
୩. ପାଠ୍ୟପୁସ୍ତକ ଅଭ୍ୟାସ ପ୍ରଶ୍ନାବଳୀର ୧୦୦% ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ସମାଧାନ (100% Complete Solved Exercises)
प्रश्न और अभ्यास
1. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दो-तीन वाक्यों में दीजिए।
(क) 'ममता' कहानी का सारमर्म अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर: 'ममता' कहानी भारतीय संस्कृति के उच्च आदर्शों, विशेषकर अतिथि-सत्कार और कर्तव्यनिष्ठा को दर्शाती है। रोहतास दुर्ग के मंत्री चूड़ामणि की विधवा पुत्री ममता अपने पिता द्वारा दिए गए स्वर्ण-मुद्रा को म्लेच्छों का उत्कोच मानकर ठुकरा देती है। पिता की मृत्यु और दुर्ग पर शेरशाह के अधिकार के बाद वह एक बौद्ध मठ के खंडहर में शरण लेती है। एक रात, चौसा युद्ध में पराजित मुगल बादशाह हुमायूँ उसकी झोंपड़ी में आश्रय माँगता है। ममता पहले हिचकिचाती है, पर अंततः 'अतिथि देवो भव' के संस्कार का पालन करते हुए उसे आश्रय देती है। हुमायूँ उसे घर बनवाने का वचन देकर जाता है। 47 साल बाद, अकबर के आदेश पर मिरजा उस स्थान पर आता है, तब ममता वृद्धावस्था में स्वर्ग सिधार जाती है। उस स्थान पर हुमायूँ की स्मृति में मंदिर बनता है, पर ममता का नाम नहीं होता। यह कहानी ममता के त्याग, धर्मनिष्ठा और निस्वार्थ सेवा को उजागर करती है।
(ख) 'ममता' कहानी का मुख्य चरित्र कौन है ? उसकी चारित्रिक विशेषताओं को बताइए।
उत्तर: 'ममता' कहानी का मुख्य चरित्र ममता है। उसकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
1. स्वाभिमानी और धर्मनिष्ठ: वह म्लेच्छों का उत्कोच (रिश्वत) स्वीकार नहीं करती और अपने ब्राह्मण धर्म पर अडिग रहती है।
2. कर्तव्यपरायण: पिता के हत्यारे और विधर्मी होने के बावजूद, वह अतिथि धर्म का पालन करती है और हुमायूँ को आश्रय देती है।
3. त्यागमयी और निस्वार्थ: वह स्वयं कष्ट सहकर हुमायूँ को अपनी झोंपड़ी में विश्राम करने देती है और जीवन भर अपनी झोंपड़ी के लिए भयभीत रहती है, पर कभी किसी से कुछ नहीं माँगती।
4. दृढ़ निश्चयी: वह अपने सिद्धांतों पर अडिग रहती है और किसी भी परिस्थिति में अपने मूल्यों से समझौता नहीं करती।
(ग) इस कहानी से आपको क्या प्रेरणा मिलती है ?
उत्तर: इस कहानी से हमें निम्नलिखित प्रेरणाएँ मिलती हैं:
1. अतिथि सत्कार: हमें संकट में पड़े किसी भी अतिथि का सत्कार करना चाहिए, भले ही वह किसी भी धर्म या जाति का हो।
2. कर्तव्यनिष्ठा: हमें अपने धर्म और कर्तव्यों का पालन निष्ठापूर्वक करना चाहिए, चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों।
3. निस्वार्थ सेवा: हमें बिना किसी स्वार्थ के दूसरों की सहायता करनी चाहिए।
4. स्वाभिमान: हमें अपने स्वाभिमान और आत्मसम्मान की रक्षा करनी चाहिए और अनैतिक साधनों से धन या सुख प्राप्त करने से बचना चाहिए।
(घ) इस कहानी में लेखक का उद्देश्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: 'ममता' कहानी में लेखक जयशंकर प्रसाद का मुख्य उद्देश्य भारतीय संस्कृति के उच्च आदर्शों और शाश्वत मूल्यों को उजागर करना है। वे दिखाना चाहते हैं कि किस प्रकार एक साधारण स्त्री (ममता) अपने धर्म, कर्तव्यनिष्ठा और अतिथि-सत्कार जैसे मूल्यों का पालन करते हुए महान बन जाती है। लेखक यह भी दर्शाना चाहते हैं कि इतिहास में कई ऐसे गुमनाम नायक और नायिकाएँ होती हैं, जिनके त्याग और बलिदान को भुला दिया जाता है, लेकिन उनके कार्य मानवीय मूल्यों की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। यह कहानी मानवीय संवेदनाओं, त्याग और निस्वार्थ सेवा का संदेश देती है।
2. निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर एक या दो वाक्यों में दीजिए।
(क) रोहतास दुर्ग के प्रकोष्ठ में बैठी हुई युवती ममता किसे देख रही थी ?
उत्तर: रोहतास दुर्ग के प्रकोष्ठ में बैठी हुई युवती ममता शोण नदी के तीक्ष्ण गंभीर प्रवाह को देख रही थी।
(ख) ममता का यौवन किसके समान उमड़ रहा था ?
उत्तर: ममता का यौवन शोण नदी के समान उमड़ रहा था।
(ग) संसार में सबसे तुच्छ निराश्रय प्राणी कौन है ?
उत्तर: संसार में सबसे तुच्छ निराश्रय प्राणी हिन्दू विधवा है।
(घ) चूड़ामणि क्यों व्यथित हो गये ?
उत्तर: चूड़ामणि अपनी विधवा पुत्री ममता के दुःख और भविष्य की चिंता से व्यथित हो गये।
(ङ) ममता ने पिता का उपहार क्यों स्वीकार नहीं किया ?
उत्तर: ममता ने पिता का उपहार (स्वर्ण-मुद्रा) यह कहकर स्वीकार नहीं किया कि वह म्लेच्छों का उत्कोच है और ब्राह्मणों को ऐसा धन स्वीकार नहीं करना चाहिए।
(च) चूड़ामणि का हृदय क्यों धक् धक् करने लगा ?
उत्तर: चूड़ामणि का हृदय पठानों की डोलियों के दुर्ग में प्रवेश करने और शेरशाह द्वारा दुर्ग पर अधिकार करने की आशंका से धक् धक् करने लगा।
(छ) ब्राह्मण-मन्त्री कैसे मारा गया ?
उत्तर: ब्राह्मण-मन्त्री चूड़ामणि पठानों द्वारा डोलियों की जाँच करने पर विरोध करने के कारण तलवारों से मारा गया।
(ज) मौर्य और गुप्त सम्राटों की कीर्त्ति का खण्डहर कहां था ?
उत्तर: मौर्य और गुप्त सम्राटों की कीर्त्ति का खण्डहर काशी के उत्तर धर्मचक्र बिहार में था।
(झ) भारतीय शिल्प की विभूति कहां बिखरी हुई थी ?
उत्तर: भारतीय शिल्प की विभूति भग्नचूड़ा, तृणगुल्मों से ढके प्राचीर और ईंटों के ढेर में बिखरी हुई थी।
(ञ) 'सब विधर्मी दया के पात्र नहीं' - ऐसा ममता ने क्यों कहा ?
उत्तर: ममता ने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि मुगल (हुमायूँ) उसके पिता के हत्यारे शेरशाह के ही वंशज थे और विधर्मी थे, जिनसे उसे अपने पिता की हत्या का स्मरण हो आया था।
(ट) स्त्री क्या विचार कर रही थी ?
उत्तर: स्त्री (ममता) विचार कर रही थी कि उसे अपने धर्म के अनुसार अतिथि देव की उपासना करनी चाहिए या विधर्मी होने के कारण उसे आश्रय नहीं देना चाहिए।
(ठ) ममता ने मन में क्या कहा ?
उत्तर: ममता ने मन में कहा, "यहाँ कौन दुर्ग है! यही झोंपड़ी है, जो चाहे ले ले। मुझे तो अपना कर्त्तव्य करना पड़ेगा।"
(ड) किसके प्रकाश में मुगल ने ममता का मुखमण्डल देखा ?
उत्तर: मुगल ने चन्द्रमा के मंद प्रकाश में ममता का मुखमण्डल देखा।
(ढ) ममता ने मुगल से क्या कहा ?
उत्तर: ममता ने मुगल से कहा, "जाओ भीतर, थके हुए भयभीत पथिक! तुम चाहे कोई हो, मैं तुम्हें आश्रय देती हूँ। मैं ब्राह्मण-कुमारी हूँ, सब अपना धर्म छोड़ दें तो मैं भी क्यों छोड़ दूँ?"
(ण) प्रभात में खण्डहर की सन्धि से ममता ने क्या देखा ?
उत्तर: प्रभात में खण्डहर की सन्धि से ममता ने सैकड़ों अश्वारोहियों को उस प्रान्त में घूमते देखा।
(त) किस युद्ध को बहुत दिन बीत गये ?
उत्तर: चौसा के मुगल-पठान युद्ध को बहुत दिन बीत गये।
(थ) हुमायूँ ने एक दिन कहाँ विश्राम किया था ?
उत्तर: हुमायूँ ने एक दिन ममता की झोंपड़ी में विश्राम किया था।
(द) हुमायूँ कौन था ? उसका युद्ध किससे और कहाँ हुआ ?
उत्तर: हुमायूँ मुगल बादशाह था। उसका युद्ध शेरशाह से चौसा नामक स्थान पर हुआ था।
(ध) हुमायूँ ने मिरजा से क्या करने के लिए कहा ?
उत्तर: हुमायूँ ने मिरजा से उस स्त्री (ममता) का घर बनवाने के लिए कहा था।
(न) ममता ने अश्वारोही से क्या कहा ?
उत्तर: ममता ने अश्वारोही से कहा, "मैं नहीं जानती वह शाहंशाह था या साधारण मुगल; पर एक दिन इसी झोंपड़ी के नीचे वह रहा था। मैंने सुना था, वह मेरा घर बनाने की आज्ञा दे गया था। मैं आजीवन अपनी झोंपड़ी खुदवाने के डर से भयभीत रही थी।"
3. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक-एक शब्द में दीजिए।
(क) रोहतास दुर्गपति के मन्त्री कौन थे ?
उत्तर: चूड़ामणि
(ख) ममता किसकी पुत्री थी ?
उत्तर: चूड़ामणि की
(ग) शोण के प्रवाह में अपना जीवन मिलाने में कौन बेसुध थी ?
उत्तर: ममता
(घ) सुनहली सन्ध्या में किसका पीलापन विकीर्ण होने लगा ?
उत्तर: सुवर्ण का
(ङ) म्लेच्छ का उत्कोच किसने स्वीकार किया था ?
उत्तर: चूड़ामणि ने
(च) किसने कहा कि 'माता', मुझे आश्रम चाहिए ?
उत्तर: मुगल (हुमायूँ)
(छ) कौन-से युद्ध में शेरशाह से विपन्न होकर मुगल रक्षा चाहता था ?
उत्तर: चौसा युद्ध में
(ज) किसने सोचा कि उसे अतिथि-देव की उपासना का पालन करना चाहिए ?
उत्तर: ममता ने
(झ) 'भाग्य का खेल है' - यह वाक्य किसने कहा ?
उत्तर: मुगल (हुमायूँ)
(ञ) सैनिकों के खोजने पर ममता कहाँ चली गयी ?
उत्तर: मृगदाव में
(ट) किसका जीर्ण-कंकाल खांसी से गूंज रहा था ?
उत्तर: ममता का
(ठ) ममता की सेवा के लिए गांव की कितनी स्त्रियां उसे घेर कर बैठी थीं ?
उत्तर: दो-तीन
(ड) कौन अवाक् खड़ा था ?
उत्तर: अश्वारोही
(ढ) ममता की झोंपड़ी पर कौन-सा मन्दिर बना ?
उत्तर: अष्टकोण मंदिर
(ण) सातों देशों का नरेश कौन था ?
उत्तर: हुमायूँ
(त) गगनचुम्बी मन्दिर किसने बनवाया ?
उत्तर: अकबर ने
(थ) किसमें ममता का नाम नहीं था ?
उत्तर: मंदिर के शिलालेख में
(द) किसने कहा कि 'यह महिलाओं का अपमान करना है' ?
उत्तर: पठानों ने
(ध) ममता को एक स्त्री ने किससे जल पिलाया ?
उत्तर: सीपी से
4. निम्नलिखित अवतरणों को पढ़कर उनका आशय स्पष्ट कीजिए।
(क) उसका यौवन शोण के समान ही उमड़ रहा था ।
आशय: इस पंक्ति का आशय यह है कि ममता युवावस्था में थी और उसका यौवन शोण नदी के तेज प्रवाह के समान उमड़ रहा था। लेकिन इस उमड़ते यौवन में सुख और उल्लास नहीं था, बल्कि विधवा होने के कारण दुःख, वेदना और निराशा भरी हुई थी, जो उसके मन में तूफान की तरह चल रही थी।
(ख) शोण के प्रवाह में वह अपना जीवन मिलाने में बेसुध थी ।
आशय: इस पंक्ति का आशय यह है कि ममता अपने जीवन के दुःखों और वेदनाओं में इतनी अधिक डूबी हुई थी कि वह अपने आसपास की दुनिया से पूरी तरह बेखबर थी। वह शोण नदी के तेज प्रवाह को देखते हुए अपने दुःख भरे जीवन को उसी में विलीन करने की कल्पना में खोई हुई थी, उसे अपने पिता के आने का भी पता नहीं चला।
(ग) इस पतनोन्मुख प्राचीन सामन्त वंश का अंत समीप है ।
आशय: यह वाक्य चूड़ामणि ने ममता से कहा था। इसका आशय यह है कि रोहतास दुर्ग पर शेरशाह के आक्रमण का खतरा मंडरा रहा था। चूड़ामणि को यह स्पष्ट दिख रहा था कि उनका सामंती वंश और रोहतास दुर्ग का शासन अब समाप्त होने वाला है। वे भविष्य की इस अनिश्चितता और पतन को स्पष्ट रूप से महसूस कर रहे थे।
(घ) परन्तु तुम भी वैसे ही क्रूर हो । वही भीषण रक्त की प्यास, वही निष्ठुर प्रतिबिम्ब तुम्हारे मुख पर भी है ।
आशय: यह वाक्य ममता ने मुगल बादशाह हुमायूँ से कहा था। इसका आशय यह है कि ममता हुमायूँ को देखकर उसे भी अन्य मुगलों और पठानों की तरह क्रूर, रक्तपिपासु और निर्दयी मानती है। उसे हुमायूँ के चेहरे पर भी वही क्रूरता और निष्ठुरता दिखाई देती है, जो उसके पिता के हत्यारों में थी, इसलिए वह उसे आश्रय देने में हिचकिचाती है।
(ङ) मैं ब्राह्मण-कुमारी हूँ, सब अपना धर्म छोड़ दें तो मैं भी क्यों छोड़ दूँ ?
आशय: यह वाक्य ममता ने हुमायूँ को आश्रय देते समय कहा था। इसका आशय यह है कि ममता अपने ब्राह्मण धर्म और भारतीय संस्कृति के 'अतिथि देवो भव' के सिद्धांत पर दृढ़ थी। भले ही हुमायूँ विधर्मी और उसके पिता के हत्यारों के वंश का था, लेकिन संकट में आया अतिथि उसके लिए पूजनीय था। वह कहती है कि यदि दूसरे लोग अपने धर्म और कर्तव्य का पालन न करें, तो भी वह अपने धर्म (अतिथि सत्कार) से विमुख नहीं होगी।
(च) उस स्त्री को मैं कुछ भी न दे सका ।
आशय: यह वाक्य हुमायूँ ने अपने सेनापति मिरजा से कहा था। इसका आशय यह है कि हुमायूँ ममता द्वारा दिए गए आश्रय और सहायता के बदले उसे कुछ भी नहीं दे पाया था। वह ममता के निस्वार्थ सेवाभाव से प्रभावित था और उसे कृतज्ञता स्वरूप कुछ देना चाहता था, पर दे नहीं पाया। इसलिए वह मिरजा को आदेश देता है कि उस स्त्री के घर को बनवा दिया जाए।
(छ) अब तुम इसका मकान बनाओ या महल, मैं अपने चिर विश्राम-गृह में जाती हूँ।
आशय: यह वाक्य ममता ने अपनी मृत्यु के समय अश्वारोही से कहा था। इसका आशय यह है कि ममता का जीवन अब समाप्त होने वाला है और वह इस संसार को छोड़कर अपने अंतिम विश्राम स्थल (मृत्यु) की ओर जा रही है। उसे अब इस बात की कोई चिंता नहीं है कि उसकी झोंपड़ी का क्या होगा या उस स्थान पर क्या बनेगा। वह अपने जीवन के भय और चिंताओं से मुक्त होकर शांति से मृत्यु को गले लगाने को तैयार है।
5. निम्नलिखित वाक्यों को 'किसने' और 'किससे' कहा ?
(क) क्या आपने म्लेच्छ का उत्कोच स्वीकार कर लिया ?
उत्तर: यह वाक्य ममता ने अपने पिताजी (चूड़ामणि) से कहा।
(ख) यह महिलाओं का अपमान करना है ।
उत्तर: यह वाक्य पठानों ने चूड़ामणि से कहा।
(ग) माता, मुझे आश्रय चाहिए ।
उत्तर: यह वाक्य मुगल (हुमायूँ) ने ममता से कहा।
(घ) गला सूख रहा है, साथी छूट गये हैं, अश्व गिर पड़ा है ।
उत्तर: यह वाक्य मुगल (हुमायूँ) ने ममता से कहा।
(ङ) उस स्त्री को मैं कुछ भी न दे सका ।
उत्तर: यह वाक्य मुगल (हुमायूँ) ने मिरजा से कहा।
भाषा - ज्ञान
1. प्रस्तुत कहानी में अनेक तत्सम शब्द आये हैं । जैसे - कंटक, दुर्गपति, निराश्रय आदि । इसी तरह इस पाठ में आए तत्सम शब्दों को छाँटिए और उनका अर्थ लिखिए ।
उत्तर:
2. निम्नलिखित वाक्यों पर ध्यान दीजिए ।
उपर्युक्त वाक्यों में 'बरसात' स्त्रीलिंग है और 'उत्कोच' पुंलिंग है । इसी कारण इन शब्दों के पहले प्रयुक्त विभक्ति का प्रयोग क्रमशः 'की' और 'का' के रूप में हुआ है । इसी तरह के वाक्य चुनकर रेखांकित करने के साथ-साथ लिंग बताइए ।
उत्तर:
1. "ममता विधवा थी। उसका यौवन शोण के समान ही उमड़ रहा था।" - यौवन (पुल्लिंग)
2. "मन में वेदना, मस्तक में आँधी, आँखों में पानी की बरसात लिए वह सुख के कंटक-शयन में विकल थी।" - वेदना (स्त्रीलिंग), आँधी (स्त्रीलिंग), पानी (पुल्लिंग), बरसात (स्त्रीलिंग), कंटक-शयन (पुल्लिंग)।
3. "सुवर्ण का पीलापन उस सुनहली संध्या में विकीर्ण होने लगा।" - सुवर्ण (पुल्लिंग), पीलापन (पुल्लिंग), संध्या (स्त्रीलिंग)।
4. "तलवारें खिंचीं, ब्राह्मण मंत्री वहीं मारा गया।" - तलवारें (स्त्रीलिंग), मंत्री (पुल्लिंग)।
5. "भारतीय शिल्प की विभूति, ग्रीष्म रजनी की चन्द्रिका में अपने को शीतल कर रही थी।" - शिल्प (पुल्लिंग), विभूति (स्त्रीलिंग), रजनी (स्त्रीलिंग), चन्द्रिका (स्त्रीलिंग)।
6. "मुगल अपनी तलवार टेक कर उठ खड़ा हुआ।" - तलवार (स्त्रीलिंग)।
7. "उसका जीर्ण कंकाल खाँसी से गूंज रहा था।" - कंकाल (पुल्लिंग), खाँसी (स्त्रीलिंग)।
8. "वहाँ एक अष्टकोण मन्दिर बना और उस पर शिलालेख लगाया गया।" - मन्दिर (पुल्लिंग), शिलालेख (पुल्लिंग)।
3. नीचे लिखे वाक्यों में विराम चिह्न लगाइए ।
मैं नहीं जानती कि वह शाहंशाह था या साधारण मुगल पर एक दिन इसी झोंपड़ी के नीचे वह रहा था मैंने सुना था वह मेरा घर बनानेकी आज्ञा दे गया था मैं आजीवन अपनी झोंपड़ी खुदवाने के डर से भयभीत रही थी ।
उत्तर:
"मैं नहीं जानती कि वह शाहंशाह था या साधारण मुगल, पर एक दिन इसी झोंपड़ी के नीचे वह रहा था। मैंने सुना था वह मेरा घर बनाने की आज्ञा दे गया था। मैं आजीवन अपनी झोंपड़ी खुदवाने के डर से भयभीत रही थी।"
4. नीचे दिये गये उपसर्ग एवं प्रत्यय-युक्त शब्दों के मूल शब्द बताइए ।
प्रकोष्ठ, निराश्रय
इस तरह के कुछ शब्दों की सूची तैयार कीजिए ।
उत्तर:
1. प्रकोष्ठ: प्र (उपसर्ग) + कोष्ठ (मूल शब्द)
2. निराश्रय: निर् (उपसर्ग) + आश्रय (मूल शब्द)
अन्य शब्द:
3. असमर्थ: अ (उपसर्ग) + समर्थ (मूल शब्द)
4. विपन्न: वि (उपसर्ग) + पन्न (मूल शब्द)
5. दुश्चिन्ता: दुस् (उपसर्ग) + चिन्ता (मूल शब्द)
6. अवाक्: अ (उपसर्ग) + वाक् (मूल शब्द)
7. अष्टकोण: अष्ट (उपसर्ग) + कोण (मूल शब्द)
8. अश्वारोही: अश्व (मूल शब्द) + आरोही (प्रत्यय)
9. विधर्मी: वि (उपसर्ग) + धर्म (मूल शब्द) + ई (प्रत्यय)
10. पारिवारिक: परिवार (मूल शब्द) + इक (प्रत्यय)
11. ऐतिहासिक: इतिहास (मूल शब्द) + इक (प्रत्यय)
12. सांस्कृतिक: संस्कृति (मूल शब्द) + इक (प्रत्यय)
13. प्रारंभिक: प्रारंभ (मूल शब्द) + इक (प्रत्यय)
14. उल्लेखनीय: उल्लेख (मूल शब्द) + अनीय (प्रत्यय)
15. आलोचनात्मक: आलोचना (मूल शब्द) + आत्मक (प्रत्यय)
16. पतनोन्मुख: पतन (मूल शब्द) + उन्मुख (प्रत्यय)
17. स्नेहपालिता: स्नेह (मूल शब्द) + पालित (मूल शब्द) + आ (प्रत्यय)
18. विपत्ति: वि (उपसर्ग) + पत्ति (मूल शब्द)
19. अतिथि: अ (उपसर्ग) + तिथि (मूल शब्द)
20. गगनचुम्बी: गगन (मूल शब्द) + चुम्बी (प्रत्यय)
୪. ବୋର୍ଡ ପରୀକ୍ଷା ମାଷ୍ଟ୍ରି ଟିପ୍ସ ଓ ସାଧାରଣ ଭୁଲ୍ (Board Exam Tips & Pitfalls)
बोर्ड परीक्षा मास्टरी टिप्स (Board Exam Mastery Tips)
1. कहानी को गहराई से समझें: 'ममता' कहानी को कम से कम दो-तीन बार ध्यान से पढ़ें। कहानी के मुख्य पात्रों, घटनाओं के क्रम और उनके पीछे के भावों को समझें।
2. लेखक परिचय याद करें: जयशंकर प्रसाद का जीवन परिचय, उनकी प्रमुख रचनाएँ और उनकी साहित्यिक विशेषताएँ याद रखें। यह अक्सर छोटे प्रश्नों में पूछा जाता है।
3. पात्रों का चरित्र-चित्रण: ममता, चूड़ामणि और हुमायूँ के चरित्र की प्रमुख विशेषताओं को बिंदुवार याद करें। ममता का चरित्र-चित्रण विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
4. मुख्य घटनाओं का क्रम: कहानी में घटित होने वाली प्रमुख घटनाओं (स्वर्ण-मुद्रा प्रसंग, दुर्ग का पतन, हुमायूँ का आगमन, मंदिर निर्माण) को सही क्रम में याद रखें।
5. संदेश और उद्देश्य: कहानी से मिलने वाली प्रेरणा और लेखक के उद्देश्य को स्पष्ट रूप से समझें और उसे अपने शब्दों में व्यक्त करने का अभ्यास करें।
6. महत्वपूर्ण संवाद और उद्धरण: कहानी के कुछ महत्वपूर्ण संवादों (जैसे ममता का स्वर्ण-मुद्रा ठुकराना, हुमायूँ को आश्रय देते समय के संवाद) को याद रखें और उनका आशय स्पष्ट करने का अभ्यास करें।
7. शब्दार्थ पर ध्यान दें: पाठ में दिए गए कठिन शब्दों के अर्थों को याद करें। यह आपकी शब्दावली को बढ़ाएगा और प्रश्नों के उत्तर लिखने में मदद करेगा।
8. व्याकरण भाग का अभ्यास: भाषा-ज्ञान खंड में दिए गए तत्सम शब्द, लिंग-पहचान, विराम चिह्न और उपसर्ग-प्रत्यय का नियमित अभ्यास करें। ये अंक दिलाने वाले प्रश्न होते हैं।
9. उत्तर लेखन का अभ्यास: सभी प्रकार के प्रश्नों (एक शब्द, एक-दो वाक्य, दो-तीन वाक्य, आशय स्पष्ट करें) के उत्तर लिखने का अभ्यास करें। उत्तर स्पष्ट, संक्षिप्त और सटीक होने चाहिए।
10. समय प्रबंधन: परीक्षा में सभी प्रश्नों को हल करने के लिए समय का उचित प्रबंधन करें। किसी एक प्रश्न पर बहुत अधिक समय न लगाएँ।
साधारण गलतियाँ (Common Pitfalls)
1. कहानी को सतही तौर पर पढ़ना: कई छात्र कहानी को केवल एक बार पढ़कर छोड़ देते हैं, जिससे वे बारीकियाँ और पात्रों के मनोभावों को नहीं समझ पाते।
2. लेखक परिचय को अनदेखा करना: लेखक परिचय को कम महत्वपूर्ण समझना और उसे याद न करना।
3. पात्रों की विशेषताओं को रटना: विशेषताओं को समझने के बजाय केवल रटने से उत्तरों में मौलिकता नहीं आती।
4. व्याकरण संबंधी त्रुटियाँ: हिंदी व्याकरण (वर्तनी, लिंग, वचन, कारक) की गलतियाँ करना, जिससे अंक कटते हैं।
5. उत्तरों में अस्पष्टता या अनावश्यक विस्तार: प्रश्न के अनुसार सटीक उत्तर न लिखकर अनावश्यक बातें लिखना या उत्तर को अस्पष्ट रखना।
6. अतिथि सत्कार के महत्व को कम समझना: कहानी के केंद्रीय संदेश 'अतिथि देवो भव' के महत्व को पूरी तरह से न समझ पाना।
7. विराम चिह्नों का गलत प्रयोग: वाक्य लिखते समय सही विराम चिह्नों का प्रयोग न करना।
8. समय का कुप्रबंधन: परीक्षा में कुछ प्रश्नों पर बहुत अधिक समय देना और कुछ प्रश्नों को अधूरा छोड़ देना।
9. रटने पर अधिक जोर: कहानी के भावार्थ और संदेश को समझने के बजाय केवल प्रश्नों के उत्तर रटने का प्रयास करना।
10. प्रश्नों को ध्यान से न पढ़ना: प्रश्न की सही मांग को समझे बिना उत्तर लिखना, जिससे उत्तर अप्रासंगिक हो जाता है।
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(ନୋଟ୍ସ ପ୍ରସ୍ତୁତି: ଉତ୍କଳ ସ୍କିଲ୍ ସେଣ୍ଟର - BSE Odisha 100% Full Textbook Master Edition)
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